
रात ओस बूॅंद गिरी ऐसी।
लगती नाजुक मोती जैसी।
पारदर्शी श्वेद हैं जलकण –
भोर में मनमोहती कैसी।
मिट्टी की खुशबू भी इनमें आ जाती।
ओस पत्तों से नीचे को खिसक आती।
सूर्य किरणों का आना पिघला मधुपान-
जीवन नश्वर है यही पाठ समझाती।
ये ओस की बूँदे,जब जमीन पर आती हैं।
रंग-बिरंगे फूलों कलियों को रिझाती हैं।
उजले स्वर्ण मोती गगन से पंख फैलाये–
हर सुबह आँखों को प्यार से भर जगाती हैं।
डॉ सुमन मेहरोत्रा,
मुजफ्फरपुर, बिहार




