भारतीय राष्ट्रचेतना के दो युगपुरुष : महामना मदनमोहन मालवीय तथा अटल बिहारी वाजपेई जी
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका स्मरण केवल औपचारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मानुभूति बन जाता है। मेरे लिए भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय जी का स्मरण विशेष अर्थ रखता है, क्योंकि मैं स्वयं महामना की बगिया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक विनम्र पुष्प रहा हूँ। मेरी उच्च शिक्षा, आचार्यत्व तथा अनुसंधान कार्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग से संपन्न हुआ है। वही विभाग, जहाँ हिन्दी साहित्य के अद्वितीय मनीषी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने भी अध्ययन किया और जिसने भारतीय बौद्धिक परंपरा को वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान की।
इसी पावन विभाग से मुझे ज्योतिष जगत के महान महान आचार्यों के साक्षात्कार, मार्गदर्शन और सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। विशेष रूप से मेरे पूज्य गुरुदेव प्रोफेसर सच्चिदानन्द मिश्र जी, भूतपूर्व अध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संरक्षण और मार्गदर्शन में अध्ययन का जो अवसर मिला, उसने मेरे चिंतन, दृष्टि और जीवन-दृष्टि को संस्कारित किया। अतः आज जब मुझे स्वयं उस विश्वविद्यालय के संस्थापक आदरणीय महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी तथा राष्ट्रपुरुष पं. अटल बिहारी वाजपेई जी के विषय में लिखने का अवसर प्राप्त हुआ है, तो मैं इसे मात्र लेखन नहीं, बल्कि कृतज्ञता और साधना का प्रसाद मानता हूँ।

पं. मदन मोहन मालवीय जी भारतीय राष्ट्रचेतना के उन शिल्पकारों में हैं, जिन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का यज्ञ बनाया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय उनकी दूरदर्शिता, सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक है। महामना जी के लिए सनातन धर्म कोई जड़ परंपरा नहीं, बल्कि जीवित सांस्कृतिक प्रवाह था, जिसमें विज्ञान, दर्शन, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का अद्भुत समन्वय था। उनका जीवन तप, त्याग, सत्य और राष्ट्रीय एकता का मूर्त रूप था।

दूसरी ओर, पं. अटल बिहारी वाजपेई जी आधुनिक भारत के ऐसे युगपुरुष रहे, जिन्होंने राजनीति को संवेदना, संवाद और साहित्यिक गरिमा से जोड़ा। वे केवल प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि विचारशील कवि, उदार लोकतांत्रिक और राष्ट्रहित के प्रति अटूट निष्ठावान चिंतक थे। अटल जी की वाणी में ओज था, पर कटुता नहीं; दृढ़ता थी, पर अहंकार नहीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रवाद मानवीय करुणा से विहीन नहीं होता, बल्कि उससे और अधिक तेजस्वी बनता है।
मालवीय जी और अटल जी के व्यक्तित्व को जोड़ने वाला सूत्र है भारतीय सनातन सांस्कृतिक चेतना। एक ने शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्र की आत्मा को पुष्ट किया, तो दूसरे ने शासन और नीति के माध्यम से उस आत्मा को वैश्विक सम्मान दिलाया। दोनों का जीवन इस सत्य का साक्ष्य है कि जब विचार शुद्ध हों और उद्देश्य राष्ट्रहित का हो, तो व्यक्तित्व कालजयी बन जाता है।
आज के समय में, जब साहित्य और विचार प्रायः तात्कालिक विमर्श तक सीमित हो जाते हैं, ऐसे साहित्यिक आयोजनों का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है। दि ग्राम टुडे न्यूज़ पोर्टल द्वारा आयोजित यह विशेष साहित्यिक उपक्रम केवल स्मृति आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और रचनात्मक साधना का संगम है। मालवीय–वाजपेई स्मृति सम्मान लेखकों और कवियों को यह स्मरण कराता है कि लेखनी केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व का माध्यम है।
इन दोनों युगपुरुषों का स्मरण हमें यह बोध कराता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, उसकी शिक्षा परंपरा, उसका साहित्य और उसका नैतिक विवेक है। जब तक ये तत्व जीवित रहेंगे, तब तक राष्ट्रचेतना भी अक्षुण्ण रहेगी। महामना और अटल जी की स्मृति में लिखी गई प्रत्येक रचना उसी चेतना की एक दीपशिखा है।
अंततः, इन महान विभूतियों को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके विचारों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण, चिंतन और सामाजिक दायित्व में उतारें। यही साहित्य का धर्म है और यही राष्ट्रसेवा का शाश्वत पथ।
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
आचार्य अरुण दैवज्ञ जी महराज
सनातन धर्म तथा संस्कृति के प्रेरक वक्ता
राष्ट्रीय अध्यक्ष: माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी
सम्पर्क सूत्र: +91-9450276488




