साहित्य

कविता किसी की रचना है

कविता ए झा

कविता किसी की रचना है
न कि कोरी कल्पना है
यह मनोवेगों से निकलती है
मन की भावनाओं को रचती है।

कभी करुण गाथा कहती!
या अपनी व्यथा लिखती !
थोड़ी! चंचल है मचलती है!
सरिता की तरह चलती है।

नहीं माँगती जो,
कविता सहानुभूति वो!
कविता किसी भी रूप में हो
दिन- हीन नहीं सम्पूर्ण होती वो।

कविता जलती नहीं
किसी को छलती नहीं
शाम की तरह ढलती है
कभी रुंधे गले कुछ कहती है।

कविता वो प्याला है,
जिसमें दर्द को सम्भाला है
कविता सागर है दुख-सुख की
जिससे कभी आँसू छलक जाता है।

✍️कविता ए झा
नवी मुम्बई

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!