
दर्शकों में कोलाहल है, मंच के पीछे
आग लगी है, शायद सीन का भाग हो,
चीखों की आवाज़ हाल में गूंज रही है,
डिजिटल इंडिया का ही यह असर हो।
शायद अब नाटक समाप्त हो गया,
दर्शको की धूमधाम से तालियां बजीं
और घर जाकर सो गए सब क्योंकि
सुबह उठकर काम पर फिर जाना है।
चाय के चर्चे में सियासत हैरान है,
मंदिर और मस्जिद का घमासान है,
जिसके नशे में वो चीखें बीच बीच मे
भी अक्सर शोर कर जाया करती हैं।
शायद सुबह तक सब भूल जाएगा,
आलू से सोना और सीवेज की गैस
से नए भारत का नया आविष्कार है,
स्वयं भारत जगतगुरु का अवतार है।
कोई चौकीदार, कोई पप्पू और कोई
बुआ-बबुआ के नाम से विख्यात है,
देश के सर्वोच्च सदन में एकाधिकार,
बिना माफ़ी दर्जनो का तिरस्कार है।
साहित्य प्रेम में मशगूल है, दर्शन
भ्रमण में और आत्मा परमात्मा के
साथ अयोध्या, काशी व मथुरा में
लवलीन विलीन होने को बेचैन है।
ईश्वर ने निमंत्रण अस्वीकार कर
दिया है, क्योंकि वहाँ भी तो स्पर्धा
अभी बहुत ज़्यादा है, और एक म्यान
में दो तलवारें कहाँ रह सकतीं हैं।
भक्त तो तालियां बजाने में माहिर हो
चुके हैं, चमचों की तालीम अधूरी है,
देवत्व ठगा हुआ महसूस कर रहा है,
विभाजन का न्याय कराह रहा है ।
आदित्य आजकल खीरे की बड़ी
डिमांड है, क्योंकि प्याज महंगी है,
पेट्रोल, डीज़ल व रसोई गैस की
क़ीमत सुरसा का मुँह बाए खड़ी है।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ




