
प्रभु मिलन की आस लिए
चल पड़े कदम मंजिल की ओर ,
आगे है घनघोर अँधेरा
डगर कठिन है मंजिल की,
मिश्रित भरे भाव हैं मन में
फिर भी आस मिलन की है उनसे,
इंतजार करते करते -हम
आ पहुँचे हैं तेरे दर पर,
अपनापन में मान कर मुझको
अब तो दरस करा दो प्रभु तुम,
वक्त हो चला है अब जाने का
इस नश्वर संसार से प्रभु,
प्रभु मिलन की आस लिए,
चल पड़े कदम मंजिल की ओर ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब




