साहित्य

सच्चा प्यार

निवेदिता सिन्हा

प्यार की कोई भाषा नहीं होती ।
सच्चे प्यार की कोई परिभाषा नहीं होती ।
हर रिश्तें में पनपता है प्यार ।
जिनसे बसता हमारा सुखी संसार ।
कुछ प्यार जन्म से होता है ।
पर कुछ प्यार वक्त के साथ पनपता है ।
सच्चा प्यार एक दूजे के मर्म को ,
बिन कहे समझ जाता है ।
प्यार अधिकार ही नही ,
कर्त्तव्य भी होता है ।
ये प्यार ही होता है कि दो अजनबी ,
एक दूजे के साथ सारी जिंदगी साथ बिताते है ।
पर क्या सभी एक दूजे के दर्द समझ पाते है ?
कुछ सिर्फ भावाव्मक खेल से सामने वाले की,
जिन्दगी दीमक की तरह चाट जाते है ।
खुद मस्ती में रह सामने वाले को,
पल- पल अपनी लाचारगी जताते है ।
जाने कितनी जिंदगियों के प्यार के सपने,
सँजने से पहले जिम्मेवारी के नाम घुट-घुटकर मर जाते है ।
सच्चा प्यार किसी धोखें ,छल-कपट का नाम नहीं होता ।
सच्चा प्यार को एक दूजे के बिन कहे,
सब कुछ समझने का एहसास होता है ।
सामने वाले को दर्द देने का नहीं ,दर्द बाँटने का होता है ।
जो अब सिर्फ किताबों के पन्नो में नजर आता है ।

निवेदिता सिन्हा
गया जी, बिहार

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