साहित्य

भय व खौफ

उदय किशोर साह

आसान नहीं है शराफत की    जिन्दगी जीना
जहाँ पे हर अपराधी का है गर्व में चौड़ा सीना
बात बात में जो नीरीह से करता है     तकरार
इनके आचरण से शर्मिन्दा है जगत      संसार

इनके जेहन में ना कोई है कभी लाज व  शर्म
नीच हरकत है जब इनका ईमान व        धर्म
लुट पाट जबरदस्ती का है जब खुली है धन्धा
सिरमौर बन बैठा है समाज में ये सब    बन्दा

ओछी हरकत की फैला दी हर   मोड़ पे गन्दगी
अमानवीय व्यवहार चेहरे पे झलकता दरिन्दगी
बम बारूद का विशाल है जिनका ये  कारोबार
शर्म से झुक जाती है शराफत की बेबस संसार

सभ्य समाज जब हो जाता है मूक व       मौन
इनके खिलाफ आवाज अब उठायेगा      कौन
सब के चेहरे पे छाई है भय खौफ का     बादल
मस्त हो अपराधिर्यो का     फैल रहा है आँचल

कानून का भी खौफ जब किसी को ना डराये
इनके खिलाफ जब कानून भी हाथ     उठाये
अपराध के विरूद्ध जब गवाह आगे ना आये
कानून भी मजबूरी में तब नतमस्तक हो जाये

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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