साहित्य

समय है संभल जाओ

नन्द किशोर बहुखंडी


अश्लीलता की चादर ओढ़ी,
आज के युवा समाज ने।

अभद्रता की सीढ़ी लाँघी,
घुटने टेक दिए पाश्चात्य के आगे।

कहाँ गई अपनी गर्वित संस्कृति,
जिसकी गूँज थी पूरे विश्व में।

विश्वगुरु भारत की शक्ति,
थल, जल, नभ में बजाती थी डंके।

वेद, रामायण, गीता आदि ग्रंथों की,
गुरुजन अध्यापन कराते थे।

शनै, शनै पाश्चात्य सभ्यता की,
साजिश भरी चाल चली ऐसे।

परिधानों में नग्नता दिखती,
अंग प्रदर्शन की होड़ लगे।

संस्कारों को भूली युवा पीढ़ी,
नशा, क्लब जाना फ़ैशन बन गए।

अश्लील गीत, संवादों की होड़ लगी,
फ़िल्मों में फूहड़पन परोसा जाए।

काव्य, कहानी ऐसी लिखी जाती,
मानसिक पतन की ओर इशारा करे।

पूजा, अर्चना, अराधना छोड़ी,
समय पर उठना त्याग दिए।

अपने बुजुर्गों को कहें रूढ़िवादी,
उनका हास्य, उपहास करें।

ऐसी अश्लीलता यदि चलती रही,
रोका गया न समय रहते।

चलेगी पतन की फिर आँधी,
कोई न रोक पाएगा इसे।

पछतावा होगा देख अवनति,
अश्रुओं की धारा बहेगी।

कहावत फिर चरितार्थ होगी,
का वर्षा जब कृषि सुखाने।

नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड

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