
रूहानियत इंसानियत मासूमियत गर है सदा।
और है पवित्र चरित्र आदमीयत इंसान में अथाह।
फिर दिव्य प्रखर तेज लाली मुख मंडल साजे।
स्वर मधुर सधे शब्द युक्त कोमल कंठ बिराजे।
कीर्ति विश्व में फैलेगी हे दिव्य पुरुष तेरी सदा।
तप त्याग योग साधना युक्त गर हो जीवन में।
रौनक बाहर खिलता गुलसिता होगा तेरे उपवन में।
गर नारी का सम्मान है और खुद के चरित्र का निर्माण।
युगो से वैदिक परंपराओं का है मन में सम्मान।
तो हे मानव तेरी विश्व में होगी जय जय सदा ओर।
इज्जत शोहरत प्रभाव नित फैलेगी जहां में सदा।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश
🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷



