
अरावली की पहाड़ियों पर लेख
इंसान की भूख कितनी है इसकी कोई सीमा नहीं। सीमा है तो उस पर लगाम लगाए रखने की अपनी इच्छाओं को सीमा में बांँधे रखने की। वैसे तो मानव ने प्राकृतिक सम्पदा को बिगाड़कर रख दिया है। इसलिए मौसम-चक्र बिगड़ चुका है। समय पर कोई भी मौसम नहीं रहता है, लेकिन इन पहाड़ियों से छेड़छाड़ करके तो इतिहास को दफन करने का कार्य ही होगा। फिर किसको पढ़ाएंगे अरावली पहाडियों का इतिहास।
जो अपने इतिहास को दफन करने में लगा हो वह दुनिया से हमेशा के लिए मिट जाया करता है। प्रकृति से ज्यादा छेड़छाड़ करना मानव सभ्यता को समाप्त करने का काम होता है। आदमी की जरूरत उतनी ही होनी चाहिए जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे। यदि मानव की इच्छा जरूरत से ज्यादा हो जाएगी तो यह प्रकृति को नष्ट करता चला जाएगा।
आज इंसान खुद प्राकृतिक आपदाओं को झेल रहा है और दूसरी तरफ वह खुद प्रकृति को नष्ट करने पर तुला है। समझ नहीं आता वह चाहता क्या है? मानव खुद ही परेशान है,व्याकुल है और रहेगा। प्रकृति से छेड़छाड़ करना कहीं तक भी जायज नहीं है। मैं तो यही कहूंँगा कि इतने दिनों से अरावली की पहाड़ियांँ मौजूद हैं। पहले भी लोग रहे होंगे, उन्होंने कभी आज तक इनको नहीं छेड़ा। वह जानते थे कि हमें प्रकृति से बहुत कुछ मिलता है, इसी से हमारा जीवन है। यदि हम इससे छेड़छाड़ करेंगे तो अपने जीवन को ही समाप्त कर बैठेंगे। मगर आज का मानव लगता है दानव बन चुका है। मात्र इंसान का चोला दिखाई पड़ता है, जबकि उसमें इंसानियत नाम की कोई चीज बाकी नहीं है।
जो प्रकृति को नष्ट करने पर तुले हुए हैं सच में ही वे राक्षस प्रवृत्ति के लोग हैं और जो इसको बनाए रखने में अपना योगदान दे रहे हैं वे देवता तुल्य हैं। बस यही फर्क है देवों और राक्षसों में।
मैं सभी से विनम्र निवेदन करूंँगा कि अरावली पहाड़ियों को नष्ट न किया जाय। इनसे बहुत बड़ा सुकून मिलता है। मानव को जिंदगी मिलती है। यह मानव को जीवन प्राण देती है,इसको ज्यौ का त्यौ रहने दे। पैसे वाले लोग तो खनन करके पैसे बना करके दूसरी जगह कहीं विदेशों में शिफ्ट हो जाएंगे लेकिन यहांँ रह जाएंगे मरने के लिए वे लोग, जिनको सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा अर्थात प्राण वायु भी नसीब नहीं होगी, पानी की तो बात ही छोड़ दीजिए।
मेरा 40 वर्षों का आत्मचिंतन है कि अब से 20 या 25 वर्ष बाद जिला मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, बागपत, गाजियाबाद और यहांँ तक कि सोनीपत, पानीपत यह पूरा जोन बिल्कुल पानीविहीन हो जाएगा। ऊपरी क्षेत्र में नदी नाले भी गंदे होकर सब सूख जाएंगे। पानी राजस्थान में पहुंँच जाएगा। वहांँ लोग एक-एक बूंँद को तरसते थे, मगर अब धीरे-धीरे बरसात और बाढ़ भी आने लगी।यदि अरावली की पहाड़ियों के साथ भी इन्होंने छेड़छाड़ की तो समझ लीजिए कि भारत की भौगोलिक स्थिति को यह सरकार या खनन करने वाले लोग, नष्ट करने का कार्य करेंगे। सृष्टि को बनाने वाले ने इसको कुछ सोच समझकर बनाया होगा ताकि इससे मानव अपने जीवन की सीमित जरूरतों को पूरा कर सके व जिन्दा रह सके। यदि इन्सान को 10 पेड़ चाहिए तो उसे अपनी जरूरत की पूर्ति हेतु 20 पेड़ पहले ही लगाकर पालन-पोषण करना चाहिए ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे। मगर आज इन्सान इन्सानियत छोड़कर, भौतिकवादी हो गया है और अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है,चाहे वह राजा की योजना हो या प्रजा की हठधर्मिता। हर कोई धन सम्पन्नता हेतु जीवन की अंधी दौड़ में दौड़ रहा है। जीवन की किसी को परवाह नहीं है। अगर किसी को है भी तो उनकी कोई सुनने को तैयार नहीं है, न जनता न सरकार। स्थिति हाथ से आगे निकलती जा रही है फिर ये सम्भाले नहीं सम्भलेगी। सरकार अपनी योजना को सही मानकर चलती है मगर उसी के प्रशासनिक अधिकारी व कुछ स्वार्थी लोग मिलीभगत करके उसको चौपट करते चले जाते हैं व शीर्ष प्रधान व मंत्रियों को लगता है कि सब कार्य ठीक हो गया। मगर जिले के मालिक की अनदेखी सब कुछ चौपट कर देती है। यदि भविष्य में धरा पर जीवन देखना चाहते हो तो 40 वर्ष पहले का नक्शा देखकर, तालाबों से अतिक्रमण हटवाकर उन्हें पानी से भरकर फिर से जिंदा करें व नदी नालों को गन्दगी व गन्दे सीवरों को कड़ाई से पालन कर रूकवाकर उन्हें स्वच्छ अविरल बहने दें। हर जगह पानी की टंकी होने के पश्चात घरों से सममर्शिबल को समाप्त करें ताकि अनावश्यक दोहन को रोका जाए। इससे पानी का लेवल नीचे नहीं जाएगा।अन्यथा विनाश काले विपरीत बुद्धि वाली कहावत ही चरितार्थ होगी।
सरकार सहित हम सभी को ऐशो-आराम को छोड़, कर्म-शीलता पर जोर देना चाहिए। हमें मानव जीवन के भविष्य की ओर देखना चाहिए। सरकार चाहे कोई भी हो, हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए जो हमें विनाश की ओर ले जाता हो। ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए।
*श्रीपाल शर्मा ईदरीशपुरी, बागपत*




