
क़रीब होकर भी कोई क़रीब दिखता कहां है
वो सपना है, हकीक़त में मिलता कहां है
लोग आते हैं, मिलते है, खो जाते
हैं
कोई किसी के दिल में रूकता कहां है
अपने ही गुरूर में हैं सभी मदमस्त यहां
कोई भी किसी से हल्का कहां है
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी
जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी सांस तक बेकरार आदमी।।
डॉ. अनीता शाही सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर
प्रयागराज




