
25 जा रहा है,26 दस्तक देने वाला है।
कोई देकर जा रहा है, कोई लेकर आ रहा है।
जाने-आने का दस्तूर चलता जा रहा है।
जबसे होश सम्भाला है,दिखता यही तो प्याला है।
नये के आने पर पुराना गोल्ड बन जाता है।
नवीन का प्राचीन बनना ऐतिहासिक तराना है।
चलो, उठकर आज कुछ ऐसा करते हैं,
अपने प्रयास में निरन्तरता लाते हैं।
किसी के गम चुराते हैं, मुरझाए चेहरे पर जादुई हँसी लाते हैं।
विहग-वृंद संग खुद भी गुनगुनाते हैं।
दाना-पानी दे करके दग्ध क्षुधा बुझाते हैं।
नववर्ष-कल्पना के पंखों को उड़ान देते हैं,
आगत मुश्किलों को फूँक मार भगाते हैं।
आगे की राह बनाते हैं, चाहतों की राह सजाते हैं।
जबतक ये सांसें चल रहीं, प्रभु संग नाता जुड़ा हुआ,
इसके अंतिम छोर पर उसमें ही विलय हो जाते हैं।
विगत पुराना हो जाता है,आगत नया कहलाता है।
इस जग की ये रीत पुरानी हरदम नई ही रहती है।
देखो, यही हमसे आकर नित नई कहानी कहती है।
कुछ भी नहीं ख़त्म होता है, हर नया पुराने से बनता है।
नये-पुराने का जंजाल, अभिलाषाओं से सजता है।
उम्मीदों के तोरण से विकास का द्वार सजाते हैं,
अथक प्रयासों से ही तो समस्त द्वार खुल जाते हैं।
विदाई औ स्वागत तो चाँद औ सूर्य की संध्या है।
इक जाता है,इक आता है,सबको गले मिलाता है।
अखिल विश्व को प्रतिदिन का आभास कराता है,
आने- जाने की परम्परा को बख़ूबी वो निभाता है।
जिसके पदचाप की रुनझुन में, पलकों पर सपने सजते हैं,
जीवन के तान आलाप लिए हम चलते ही चलते रहते हैं।
रचनाकार- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सद्यः निःसृत, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।




