
दिसंबर ले रहा अंतिम सांस,
नया साल आने को है।
मतभेद मिटा कर दिलों से
मन मलंग बन गुदगुदाने को है।
ठिठुरती रातों की यादें समेटे,
कोहरे की चादर अब सिमट रही है।
बीते कल की कड़वी बातें,
वक्त की धारा में अब छंट रही है।
न कोई शिकवा, न कोई शिकायत,
बस प्रेम का रंग अब छाने को है।
मतभेद मिटा कर दिलों से
मन मलंग बन गुदगुदाने को है।
सूरज की पहली किरण संग,
नई उम्मीदें अंगड़ाई लेंगी।
मुस्कुराहटें चेहरे पर सजेंगी,
खुशियां फिर से विदाई देंगी।
पुरानी धूल को झाड़कर अब,
नया ख्वाब हकीकत बन जाने को है।
मतभेद मिटा कर दिलों से
मन मलंग बन गुदगुदाने को है।
© लक्ष्मी दीक्षित
ग्वालियर मध्यप्रदेश




