साहित्य

उसकी ख़ामोशी

निवेदिता सिन्हा

उसकी ख़ामोशी आज भी बहुत कुछ कहती है।
वो बेजुबान मूरत नहीं,वो भी जिन्दा इंसान है।
अपना हक अक्सर शांति के लिए छोड़ देती है।
फिर भी उसकी कद्र कहाँ होती है?
पल-पल उसके वजूद पर सवाल उठाये जाते है।
सवालों की अग्नि परीक्षा रोज दोहरायें जाते हैं।
युग परिवर्तनों के साथ भी नहीं बदलती उसकी कहानी।
सदियों से जीवन दायनी के आँख में है पानी ।
अपने रिश्तें के लिए पल-पल करना पड़ता है उसे समझौता ।
लाख खुद को समझाये पर रिश्तों का एहसास दिल से नहीं मिटता।
खुद को मिटा रिश्तों को देती है नयापन।
तब भी नहीं मिटता उसका सूनापन।
घर पर बार-बार याद दिलायी जाती उसकी सीमा।
मानो वो ही पूरे परिवार की जीवन बीमा।
घुटन में भी खुशियाँ तलाश कर उसने सीखा जीना।
सारे शौक अरमान समेटे अब वो खाती भी बस जीने के लिए खाना।
अपने अधिकार के लिए पता नहीं कब तक होगा उसे यू ख़ामोशी से जीना?
उसकी ख़ामोशी जाने कब बनेगी खिलखिलाती हँसी का गाना ?
जिसके धुन से गुँज उठेगा घर आँगन संग पूरे संसार का कोना ।
निवेदिता सिन्हा
गया जी, बिहार

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