
ये ऐसा एकाकीपन है
कैसी है तन्हाई
जिनको अपना स्वजन बताते
उनसे ही रुसवाई
भीड़भाड़ में स्वप्न खो रहे
बिल्कुल हुए अकेले
मूल्यों की इतिश्री कुछ ऐसे
बढ़ते नित्य झमेले
टूट रहा घर,स्वजन बिलखते
मानवता नित रोती
स्वार्थ लोभ मत्सर के चलते
दीपक खोते ज्योती
कहने को तो सँग बहुत हैं
पास न दिखता कोई
मनमंदिर में प्रेम कहाँ अब
भोर सबेरे सोई
भौतिकता को समृद्धि कह कह
बने अकिंचन फिरते
हतभागी रावण औ लंका
कभी न शाश्वत रहते
भला किसी के सँग गयी कब
उसकी असत कमाई
सुकृत सूर्यसम कर जाते हैं
तमस करे अधमाई।
-उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक




