
फूलों की बगिया में चुपचाप पड़ी,
एक गुड़िया अंतिम कहानी कहती।
आँखों में कौतुक था कभी भरा,
आज बस खामोशी का आँचल ढहेती।
रंग–रंगे फूले थे उसके संग,
झूला झूलती थी पवन की छाँव।
पर खेल–खेल में जीवन अक्षर,
कब बन गये कठिन अध्याय बरसाव।
पंखुड़ियाँ पूछें—‘क्या खोया रे?’
किस पीड़ा ने यूँ मौन किया?
गुड़िया बोली—‘अंतिम परीक्षा में,
मन ने ही मुझको दग्ध किया।’
सपनों का आँचल टूटा जब,
बबूल भी जैसे बगिया में खिले।
पर दया के देव! तुम ही बताओ,
क्या हार सदा आँखों में मिले?
फूलों ने बढ़कर थामा तन,
बगिया ने दी सांत्वना की छाँव—
कहा—‘गुड़िया, थक कर मत सोना,
हर हार के बाद नया प्रभात गाँव।’
नीले गगन से उतरी किरन,
आशीष बनकर माथे पड़ी—
लिख दी किस्मत के पन्नों पर,
हार नहीं—एक नई कड़ी।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




