
पीली धूप ने आज
धरती की हथेली पर
सरसों-सी हँसी रख दी है।
हवा के कंधों पर बैठ
कोयल ने
शब्दों को राग दिया है।
वीणा के तारों में
सरस्वती का मौन
ज्ञान बनकर झर रहा है।
यह बसंत
केवल ऋतु नहीं—
यह मन का जागरण है,
सृजन का पहला अक्षर है,
और आशा का
पीला हस्ताक्षर है।



