
दिल का बीमार हूँ बस मुझको दवा दे कोई
बुझते दीये को ज़रा आके जला दे कोई
मेरी इतनी ही यहाँ फ़िक्र किसी को है अगर
सुर्ख़-रूई के लिए मुझको दुआ दे कोई
इस मुहब्बत से सभी का यक़ी उठ जाएगा
इश्क़ में ऐसे किसी को न दग़ा दे कोई
हर घड़ी यार ये हसरत मैं लिए फिरता हूँ
इत्तिफ़ाक़न ही सही तुमसे मिला दे कोई
आरज़ू सिर्फ़ यही मुझको सदा रहती है
मुझको भी जाम ए मुहब्बत यूँ पिला दे कोई
अपने अंदर ही मैं घूंट घूंट के यूँ मर जाऊँगा
बस मिरे पास मुझे आ के रुला दे कोई
बैठे बैठे मैं अँधेरों से बहुत उक्ता गया
अब मिरे घर के चरागों को जला दे कोई
जुस्तजू में जो मिरी ‘मीम’ रहा करता है
मेरे बिछड़े हुए साथी का पता दे कोई
फ़ैज़ अहमद’मीम
आरा बिहार




