
इक्कीसवीं सदी को आधुनिकता, वैज्ञानिक उन्नति और अभूतपूर्व विकास का युग कहा जाता है। मनुष्य ने अंतरिक्ष को नापा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास किया, संचार क्रांति ला दी और भौतिक सुविधाओं का विस्तार कर लिया। किंतु इस समस्त प्रगति के मध्य यदि किसी तत्व का सर्वाधिक ह्रास हुआ है तो वह है—नैतिकता। आचार्य शीलक राम के अनुसार आधुनिकता यदि जीवन-मूल्यों से पृथक हो जाए तो वह प्रगति नहीं, पतन का मार्ग बन जाती है। उनका चिंतन भारतीय सनातन दर्शन की उस परंपरा से अनुप्राणित है, जो विकास को नैतिक अनुशासन और आध्यात्मिक संतुलन के साथ जोड़कर देखती है।
मानव सभ्यता में अस्तित्व संबंधी तीन प्रमुख विचारधाराएँ रही हैं। पहली विचारधारा ‘चेतन’ को मूल तत्त्व मानती है और ‘जड़’ को उसकी अभिव्यक्ति। वेद, उपनिषद और अद्वैत वेदान्त सहित अनेक भारतीय दार्शनिक ग्रंथ इसी दृष्टि का समर्थन करते हैं। इस मत में नैतिकता का आधार आत्म-एकत्व है—जब समस्त सृष्टि में एक ही चेतना का वास है, तब हिंसा, शोषण और अन्याय का कोई औचित्य नहीं रह जाता। दूसरी विचारधारा ‘जड़’ को मूल तत्व मानती है और चेतना को उसी का परिणाम। भारतीय चार्वाक से लेकर आधुनिक भौतिकवादी चिंतन तक यह धारा उपस्थित रही है। जब जीवन को केवल पदार्थ और उपभोग तक सीमित कर दिया जाता है, तब नैतिकता गौण हो जाती है और सफलता का मापदंड केवल भौतिक उपलब्धि बन जाता है। तीसरी विचारधारा ईश्वर, आत्मा और प्रकृति को अनादि एवं स्वतंत्र तत्व मानती है। यह समन्वित दृष्टि कर्म, उत्तरदायित्व और नैतिक अनुशासन को जीवन का आधार बनाती है। आचार्य शीलक राम इसी विचारधारा को सर्वाधिक संतुलित और तर्कसंगत मानते हैं, क्योंकि इसमें विज्ञान, दर्शन और धर्म का समन्वय संभव है।
आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने व्यक्ति को तकनीकी दक्ष तो बनाया, परंतु उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर कर दिया। औपनिवेशिक प्रभावों ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को गौण सिद्ध करने का प्रयास किया। परिणामतः विद्यार्थी अपने ही धर्म, संस्कृति और दर्शन को बाहरी दृष्टि से समझने लगे। आज सोशल मीडिया और वैश्विक विमर्श के प्रभाव में युवाओं की वैचारिक दिशा निर्मित हो रही है। जब शिक्षा मूल्य-आधारित न होकर केवल रोजगार-केन्द्रित हो जाती है, तब नैतिकता का पतन अवश्यम्भावी हो जाता है।
इतिहास यह प्रमाणित करता है कि सत्ता का स्वभाव प्रायः स्वार्थप्रधान रहा है। साम्यवादी हो या पूंजीवादी, लोकतांत्रिक हो या राजतंत्री—हर प्रकार की सत्ता अपने अस्तित्व की रक्षा को सर्वोपरि रखती है। सत्ता के पास सेना, पुलिस, पूंजी और मीडिया की शक्ति होती है। वह जनमत को प्रभावित कर सकती है और सत्य को असत्य तथा असत्य को सत्य सिद्ध करने का सामर्थ्य रखती है। जब समाज में अंधभक्ति का वर्ग तैयार हो जाता है, तब नैतिक प्रतिरोध क्षीण हो जाता है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति हाशिए पर चले जाते हैं और चापलूसी, तिकड़म तथा छल सफलता का माध्यम बन जाते हैं।
आधुनिक विश्व में उद्योग, व्यापार, शिक्षा और चिकित्सा तक लाभ-केंद्रित हो चुके हैं। हथियार उद्योग, औषधि निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और शिक्षा का व्यवसायीकरण—इन सबने गंभीर नैतिक प्रश्न खड़े किए हैं। क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग है? क्या समृद्धि का अर्थ केवल धन-संचय है? यदि विकास मानवीय संवेदना, करुणा और न्याय से विहीन हो जाए, तो वह मानवता के लिए संकट बन जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (12/12) में कहा गया है—“अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, ध्यान से कर्मफलत्याग श्रेष्ठ है और कर्मफलत्याग से शांति प्राप्त होती है।” यह शिक्षा त्याग, संयम और आत्मनियंत्रण पर आधारित नैतिकता की स्थापना करती है। इसी प्रकार हितोपदेश में कहा गया है—
विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
अर्थात दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को पीड़ा देने के लिए होती है; जबकि सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए होती है। आज के संदर्भ में यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि प्रश्न यह है कि हमारी विद्या, शक्ति और संपत्ति किस दिशा में प्रयुक्त हो रही है।
आधुनिकता और नैतिकता का द्वंद्व आज की सबसे बड़ी चुनौती है। आचार्य शीलक राम के दर्शन के अनुसार विकास तभी सार्थक है जब वह आध्यात्मिकता, उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों के साथ समन्वित हो। जब तक विकास और नैतिकता का संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक आधुनिकता का यह वैभव भीतर से रिक्त ही रहेगा।
(यह आलेख आचार्य शीलक राम के दार्शनिक चिंतन से प्रेरित है।)
डॉ. सुरेश जांगड़ा
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी
राजकीय महाविद्यालय, सांपला, रोहतक (हरियाणा)


