साहित्य

मैय्या ही मैय्या

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

दिन दुर्गा मां के आए हैं,
सब प्रेम भरा अब रस घोलो,
तन-मन सब भक्ति के रंग में,
बस मां का एक जयकारा बोलो।


मां शीतला कहो या मां अम्बा,
चाहें दशा कहो या जगदम्बा,
मां लक्ष्मी हो या संतोषी,
मां बीजासन हो या चामुण्डा।
मां सीता हो या पार्वती,
या गोरी हो या सरस्वती,
या जन्म दिया वो माता हो,
या हो मेरी भारत माता।
नौ दिन भी अब कम पड़ते हैं,
इतनी हैं मैय्या ही मैय्या,
सबमें मां-सी मन भर ममता,
और आंचल में छैंय्या-छैंय्यां।
नहीं किसी में भेद ये करती,
इतनी पावन गंगा मैय्या,
जीवन में भक्ति का रस लूटो,
ये हम तुमसे कहते भैय्या।
करें कामना मां अम्बे से,
जीवन सबका सुखमय कर दो,
भक्ति-भाव में डूबे जन-मन,
मुस्कानों का घट भर दो।
“”””””””””””””””
कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)

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