
आ जाओ पुनः धर्म धरा पर,
राम तेरी अवश्यकता हैं।
न रहा मर्यादा जग जहां मे,
हर प्राणी की यही विवशता हैं।।
रहा न अब मर्यादित पुरुष,
न कोई सीता जैसी नारी हैं।
न रहा भरत सा भाई यहां पर,
न कौशल्या जैसी महतारी हैं।।
नही हैं केवट जैसी नाव यहां पर,
न हैं सेवरी जैसी भाव यहां पर।
न हैं मित्र सुग्रीव का प्रभाव यहां,
जग जाओ पुन: हो राम कहा।।
मानव मे मानवता दिखती नही,
यज्ञ प्रवचन कोई सुनता नहीं।
अब भक्त की भाव मिलता नही,
अब हनुमान भी दिखते कही कही।।
ऋषि मुनि घर घर है नही,
पर रावण घर घर जन्मे हैं।
वेद ग्रंथ का भाव नही जग,
पर कलह घर घर पनपे है।।
होता कलंकित कलयुग यहां,
गुरू शिष्य परम्परा दिखे नहीं।
छल कपट हर जन मे मिले,
पर प्रेम का फूल खिलता नही।।
मुंह मे राम बगल में छुरी,
यही कहावत दिखती हैं।
क्या न्याय हो क्या भागवा,
सब चंद पैसों मे बिकती हैं।।
धर्म धरा जन बुला रही,
जरा मुस्कुरा कर आओ राम।
आकर पुन: धर्म धरा पर,
धर्म ध्वजा लहराओ राम।।
राजकीय सम्मानित शिक्षक
सह कवि
मुन्ना प्रसाद
मध्य विद्यालय सरॉव दिनारा
सह मास्टर ट्रेनर PTEC sasaram
रोहतास बिहार




