
( 1)
कविता का जन्म
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मन के कोमलतम भावों ने,
ह्रदय के आहत उच्छवासों ने,
सिसकते हुए गुलाबों ने,
दम तोड़ते ख्वाबों ने,
जब कवि को विकल किया होगा,
कविता का जन्म हुआ होगा।
स्वार्थों की कुत्सित दलदल में,
प्रतिपल धँसती मानवता ने,
वैभव उजियारों के सम्मुख,
निष्प्रभ होती दीपक लौ ने,
जीवन संदेश भरा कोई,
युग हस्ताक्षर किया होगा,
कविता का जन्म हुआ होगा।
ममता के भीगे अंचल ने,
आकुल ,बिलखाते शैशव के,
रूखे-सूखे से अधरों पर,
रस का संचार किया होगा,
कविता का जन्म हुआ होगा।
पावस की मलय बहार ने,
मधुपों की मधु गुंजार ने,
निर्झर की गति और ताल ने
इठलाती- इतराती लहरों को,
तट का आधार दिया होगा,
कविता का जन्म हुआ होगा।
कलिंग धरा की लाली ने,
अणु की भक्षक रखवाली ने,
मनु के प्रियदर्शी मानव को,
करूणा उपहार दिया होगा।
कविता का जन्म हुआ होगा।
या कवि श्रापित व्याध ने फिर,
क्रौंच-युगल को शर से बेधा होगा,
इस शर-बेधन पीड़ा को सह,
भाषा ने प्रसव किया होगा।
कविता का जन्म हुआ होगा।
( 2 )
कविता
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जब
भाव अनकहे,
मन में बहे,
तब
उमड़ा अंतर,
छलकी गागर,
बही कविता,
अजस्र अबाध,
तोड़ कर सब,
कूल कगार।
कविता न चाहे,
मात्रा -छंद का बंध
न चाहे सुर -ताल।
न उलझा वाक् जाल।
न अंलकार का भार।
व्यक्त करना चाहे ये ,
सहज उद् गार।
करें जो झंकृत,
मन-वीणा के तार।
कविता ने
किसी को जगाया,
किसी को सहलाया,
किसी को बढ़ाया,
किसी को चेताया।
अंधेरे पर उकेरे,
इसने रोशनी के घेरे।
शिव-जटा से निस्सृत,
मंदाकिनी यह,
अग-जग का
करे उद्धार,
कविता की पावन
करूण धार।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली।




