
में बांधी नहीं , बांधा गया था मुझे ,
खुद की मर्जी से नहीं , जबरदस्ती मुझे ,
सबको रोका था मैने ,
पर कुछ पैसों के साथ तोला था मुझे ,
मा ने कहा की ,
पिता के घर से बेटी की डोली ,
ओर पति के घर से अर्थी उठती हैं,
औरत खुदका अस्तित्व भूलती है,
पहले पिता के नाम को अपना बनाती ,
फ़िर पति के नाम को अपना सा सजाती ,
अपनी पहचान को खुद मिटाती ,
ख्वाबों को अग्नि में स्वाह कर किसी ओर की हो जाती ,
साथ फेरे , साथ वचन कोई नहीं निभाता ,
सिवाए औरत के कोई किसी को आप नहीं बनाता ,
एक छोटी सी बात है,
ना घर है उसके पास ना नाम उसक है,
सिर्फ खुदको बंधा पाया है,
रिश्तों में उसने खुदको ,
साजन के नाम की मेंहदी – हल्दि लगा कर ,
खुद 16 श्रृंगार कर त्यार बैठी हैं,
लाख उम्मीदों को बांध कर ,
सब सहने को त्यार है,
रिश्ते नए बनाने हैं,
भरोसा दिलाना है,
बिना तयारी के त्यार बैठी हैं,
बिना तयारी के त्यार बैठी हैं ,
डर रही है,
नई मुश्किलों से,
खुश है ,
पर खामोश है,
अपने होने पर ,
क्या पता कोई सवाल है??
ना नाम है साथ ,
ना अपना परिवार ,
अकेली जा रही है,
एक नए परिवार और नाम के साथ ,
बिना तयारी के त्यार बैठी हैं,
बिना तयारी के त्यार बैठी हैं ।।
– रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)




