
मुझे समझना हर किसी की बात नहीं,
चेहरे से मन का अंदाज,
नहीं लगता।
मैं वो कोरे पन्ने की किताब हूँ,
जिसमें मेरी कहानी छुपी है ।
मेरी खामोशी मेरे दिल से
बयाँ होती है,
मैं वो बिना आवाज की साज हूँ, जिस पर मेरे एहसासों की
धुन बजती है।
मैं वो नगमा हूँ जिसमें मेरे
जज्बात लिखे हैं।
मेरी लिखी पंक्तिया मेरे
मेरे जज्बातों को बयाँ
करते हैँ,
***
डॉ. संगीता पाण्डेय,”संगिनी”,
असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी,
(पी. एस. एम. पी. जी. कोलेज, कन्नौज,)
स्वरचित मौलिक.




