
सुकर्मों का संबल हो मीत।
सजाकर सत्कर्मों की रीत।।
सभी को गले लगाओ नित्य।
रचो सुंदर सुगठित साहित्य ।।
मधुर हो वाणी का अवलंब।
सुखद सन्मार्गों का नित खंब।।
सभी धर्मों का हो सम्मान।
न हो अब अवगुंठन अपमान।।
परिश्रम पावन कृत आचार।
सुखी मानव जीवन का सार।।
सुयश संयम को कर स्वीकार।
खुशी की बगिया खिले बहार।।
सदा हो सर्व धर्म समभाव।
सभी पंथों में हो सद्भाव।।
न खोना भाईचारा मित्र।
न बिगड़े भारत माँ का चित्र।।
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




