आतप का बढता कहर,, चैन ढूंढ़ रहा ठाँव।
धूप हो गई चटकीली,जले शहर औ गाँव।
लम्बा पथ जलता हुआ ,दूर बहुत है पड़ाव।
करता है इन्कार तन, उठे न मन के पाँव।।
ताप धूप का हँस रहा,रे!पागल इन्सान।
तेरे कर्मों की सजा, दिया प्रकृति ने जान।
मानव का है कर्म क्या,भूल बने अनजान ।
जोड़. जोड़ के रख रहे, जीवन के सामान।
संगीता श्रीवास्तव



