साहित्य

दोहा

संगीता श्रीवास्तव

आतप का बढता कहर,, चैन ढूंढ़ रहा ठाँव।

धूप हो गई चटकीली,जले शहर औ गाँव।

 

लम्बा पथ जलता हुआ ,दूर बहुत है पड़ाव।

करता है इन्कार तन, उठे न मन के पाँव।।

 

ताप धूप का हँस रहा,रे!पागल इन्सान।

तेरे कर्मों की सजा, दिया प्रकृति ने जान।

 

मानव का है कर्म क्या,भूल बने अनजान ।

जोड़. जोड़ के रख रहे, जीवन के सामान।

 

संगीता श्रीवास्तव

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