हमारी प्रिय सरकार ने सांसदों का वेतन और भत्ता बढ़ाने का निर्णय लिया है। ये बहुत सार्थक निर्णय है। हमारे माननीय 24 में से 18 20 घंटे काम करते हैं। पाँच साल जनता निचोड़ कर रख देती है इनको। धूल, मिट्टी, बारिश, ठंड हर मौसम सैनिकों जैसे तत्पर सजग रहते हैं।
जनता को हल्की सी खांसी आए या खरोच, सब काम छोड़ भगवान विष्णु जैसे क्षीर सागर से दौड़े चले आते हैं।
अगर पाँच साल बाद बेवफा जनता ने दोबारा मौका नहीं दिया तो चुटकी भर पेंशन, और थोड़ी बहुत सुविधाएँ जो आम जनता को दिए जाने वाले पाँच किलो राशन से थोड़ी कम होती है गुजारा करते हैं। और अगर इनके समर्पण, त्याग और सेवा भाव से खुश होकर जनता ने फ़िर मौका दिया तो पुनः जुट जाते हैं सेवा में। कोई कोई तो चालीस पचास साल तक इतनी सेवा करते हैं कि स्वर्ग में इंद्र के बगल वाली सीट आरक्षित कर लेते हैं। वो तो आजकल इंद्र का सिंहासन नहीं डोलता नहीं तो इंद्र मेनका रम्भा भेजकर इनकी तपस्या भंग करा देते।
सरकार को जब लगता है कि इनकी सेवाओं के बदले दी जाने वाली सौगात कम पड़ रही है तो वो अपनी जनता से थोड़े त्याग की प्रार्थना करती है और रिटायर लोगों की पेंशन से, डीज़ल पेट्रोल से, टोल से, थोड़ा सहयोग इकट्ठा कर इनके मानदेय में बढ़ोत्तरी कर देती है। हमारी दयालु जनता जो इन्हें भगवान स्वरूप मानती है खुशी खुशी अपना अंशदान इनके लिए समर्पित कर देती है।
हमारे इन देव तुल्य सेवकों को कई बार यह मासिक मानदेय कम पड़ जाता है जनता की सेवा के लिए तो वह रेत के खदान से, सरकारी पुल पुलिया बिल्डिंग या सड़क निर्माण से, सरकारी अनाज की सप्लाई के ठेके से, या इसी तरह के अन्य माध्यमों से थोड़े और पैसे की व्यवस्था करते हैं ताकि जनता की सेवा में कहीं कमी न आए।
हमारे देश में जिसे देश या जनता की सेवा का कीड़े ने किसी को काट लिया तो उसका ज़हर सालों तक शरीर में रहता है कई बार तो कई पीढ़ियों तक डीएनए में बस जाता है। फ़िर वो लोग कई पीढ़ियों तक जनता की सेवा करते रहते हैं। ऐसे लोगों को आम बोली भाषा में महाराज भी कहती है जनता। ऐसे महाराजों की किसी पीढ़ी में कोई मंदबुद्धि या दिव्यांग निकल आए तो भी जनता पूरी श्रद्धा और सम्मान से उनको चुनती है। क्योंकि वर्षों से सेवा भाव की भावना इनके ख़ून में दौड़ती आई है भले अक्ल हो न हो वो जनता की सेवा में कोई कोताही नहीं करेगा ऐसा जनता विश्वास करती है।
हर पाँच साल बाद जब नई सरकार बनती है उन सब को महसूस होता है कि इनकी सेवा के बदले दिया जाने वाला मानदेय कम है इसलिए सब पार्टी के लोग एकमत होकर इसे बढ़ाने का निर्णय लेते हैं।
हमारा दुर्भाग्य है कि एक सौ चालीस करोड़ जनता की सेवा के लिए बीते पचहत्तर सालों में केवल पांच सौ पैतालीस सेवक बना पाए हम। अब यह सुअवसर आया है कि इनकी संख्या बढ़ने वाली है। अब यह शिकायत मत कीजियेगा कि इतने लाख लोगों पर इतने शिक्षक हैं या इतने हजार पर इतनी पुलिस या फिर इतने सौ पर इतने डाक्टर हैं देश में। अगर इनकी संख्या बढ़ेगी तो सबकी बढ़ेगी ऐसा सोचिए। हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा बढ़कर चार करोड़ हो सकता है। पाँच किलो राशन बढ़कर आठ किलो हो सकता है। सिलेंडर की बुकिंग पच्चीस दिन की जगह पंद्रह में हो सकती है। उम्मीद रखिए, आशावान सोच रखिए। ये जब आठ सौ से ज्यादा हो जाएंगे तो इनके स्टाफ के लिए भी नौकरियाँ निकलेंगी। इनके लँगू झङ्गू की संख्या बढ़ेगी, मोहल्ले में नए नेता जन्म लेंगे।
दो हजार सैंतालीस तक अगर विकसित भारत बनाना है तो इतने त्याग के लिए तैयार रहिए। राम सेतु के निर्माण में नन्हीं गिलहरी के योगदान को याद कीजिए। आप का चुटकी भर त्याग एक सागर का निर्माण करेगा।
जय हिंद जय भारत
©संजय मृदुल




