आलेख

वह दिन दूर नहीं जब आने वाला समय कुंवारेपन का युग होगा

डाॅ.धनंजय मणि त्रिपाठी

एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार अगले छ:वर्षो में विश्व की लगभग 45% लड़कियां अविवाहित रह जाएंगी।यह रिपोर्ट 01फरवरी 2025 को प्रकाशित लोकमत अखबार में छपी थी,जो मार्गन स्टेनली संस्था द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन पर आधारित है।
*सर्वेक्षण में पाए गए कुंवारेपन की समस्या के प्रमुख कारण एवं समस्या के दुष्परिणाम:-*
1- आज कल हमारी लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और अपने विवाह के स्थान पर वे अपने कैरियर को विशेष प्राथमिकता दे रही हैं।
2- वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने जीवन में किसी पर निर्भर रहना भी नहीं चाहती हैं।
4-उन्हें स्वतंत्रता प्रिय है और वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेना चाहती हैं।
5- विवाह,मातृत्व,परिवार और पारिवारिक बंधनों को वे अक्सर अपनी प्रगति में बाधा मानने लगी हैं।
5- यदि लड़कियों में यही प्रवृति बनी रही तो हमारी पारंपरिक परिवार प्रणाली और सामाजिक संरचना बिखर सकती है।
6- जनसंख्या में गिरावट,कुंवारे लड़कों की संख्या में वृद्धि और वृद्धावस्था में अकेलेपन की समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
7- प्रश्न यह भी उठता है कि आखिरकार मनुष्य की समृद्धि,प्रगति,पद,प्रतिष्ठा और पैसा किस काम आएंगे, जब उसके जीवन के अन्तिम समय में उसका साथ देने वाला ही कोई नही होगा।
*कई माता- पिता अपनी पुत्रियों के लिए रिश्ते तो ढूंढ रहे हैं,किन्तु उनकी लड़कियों को स्वयं विवाह में कोई रूचि नहीं होती,जिसके कारण उनके द्वारा प्रत्येक रिश्ता नकारा जा रहा है।*
*बड़े अफ़सोस की बात है कि समाज के एक बड़े वर्ग को इस बदलाव की गंभीरता का अभी एहसास नहीं हो रहा है, जबकि अब हम सभी के लिए समय रहते सज़ग होना अत्यन्त आवश्यक हो गया है।*
*वर्तमान परिस्थितियों में लड़कियों के विवाह के लिए उपयुक्त आयु 21 से 25 वर्ष ही होनी चाहिए,यदि सम्भव हो तो 25 वर्ष से पूर्व ही प्रत्येक दशा में बेटियों का विवाह कर देना ही सर्वोत्तम होगा।इसके लिए सामूहिक स्तर पर जागरूकता और पहल जरूरी है।*
*यह विषय किसी के विरोध में नहीं,बल्कि भविष्य की स्थिरता और संतुलन की चिंता के तहत उठाया जाना अपरिहार्य हो गया है। हमारे समाज,परिवार और व्यक्तिगत जीवन तीनों को संतुलित रखना एवं संतुलित विकास ही मानव समाज की सच्ची प्रगति है।*
*हम सभी को इस महत्वपूर्ण विषय पर सकारात्मक विचार एवं सकारात्मक प्रयास अवश्य करना चाहिए।*
*।।भविष्य में संभावित एक ज्वलंत समस्या।।*
1- जब बच्चों का विवाह 20 वर्ष की आयु में होता था, तो उस परिवार में एक सदी में 05 पीढ़ियाँ होती थीं।

2- जब बच्चों का विवाह 25 वर्ष की आयु में होने लगा,तो उस परिवार में एक सदी में 04 पीढ़ियाँ होने लगीं।

3- किन्तु अब बच्चों का विवाह 30- 35 वर्ष की आयु में होने लगा है,तो एक सदी में अब मात्र 03 पीढ़ियाँ ही होने लगी हैं।
👉🏿 *यह अत्यन्त चिंतनीय एवं विचारणीय विषय है कि इस कुप्रवृत्ति के बढ़ने से क्या हमारा समाज और परिवार अगली सदी तक जीवित रहेगा ?*
आज हमारे समाज और परिवारों में एक अजीब सा अंधेरा फैल रहा है,गली-मोहल्ले वीरान होने लगे हैं, आस-पास के घर खाली पड़े हैं।आज बड़ी संख्या में घरों में बच्चों की किलकारियां और उनके कलरव कम सुनने को मिलते हैं,किन्तु घरों के अंदर से पति-पत्नी की आवाजें अधिक सुनाई दे रही हैं।

★आज बहुत बड़ी संख्या में लड़कियाँ 30-35 वर्ष की आयु तक कुंवारी ही रहना पसंद कर रही हैं।
★ इतना ही नहीं बल्कि लड़के भी बड़ी संख्या में 35-38 वर्ष की आयु के बाद भी कुँवारें ही घूम रहे हैं।
★आज जब लड़के – लड़कियों की इतनी देर से शादी होती भी है,तो उनकी आयु की परिपक्वता के फलस्वरूप उनके व्यवहार का लचीलापन कठोरता में परिवर्तित हो जाता है,यहाँ तक कि उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में सहनशीलता और परस्पर सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता में भी पर्याप्त कमी आ जाती है,जिसके कारण अतिशीघ्र ही उनके दाम्पत्य जीवन में तकरार होने एवं सम्बंध विच्छेद (तलाक) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है,जिसके फलस्वरूप बिखरा हुआ दाम्पत्य जीवन,टूटते परिवार,दुःखी माता-पिता अपना अकेलेपन का जीवन जीने को विवश दिखाई देते हैं।यहाँ तक कि पूरी पीढ़ी खालीपन का अनुभव करती है। फ़िर क्या हम इसे “पढ़ा-लिखा,सभ्य और सुसंस्कृत समाज”,कहें या “स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाला आत्मघाती समाज” कहना ज्यादा उचित होगा।
यदि इस अवधारणा के मूल में देखा जाए तो यह तो हमारी जनसंख्या कम करने की एक खामोश साज़िश दिखाई देती है।

★क्यों कि अगर 50 जोड़ों में सिर्फ़ एक ही बच्चे का जन्म होता है,तो अगली पीढ़ी में सिर्फ़ नाममात्र के ही बच्चे होंगे।

👉 यदि सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो तीसरी पीढ़ी लगभग गायब/विलुप्त सी हो जाएगी।

👉 मोहल्ले,गलियाँ खाली पड़ी हैं।गाँव के गाँव खत्म हो रहे हैं।शहरों में भी ऊँची इमारतें तो हैं,लेकिन संयुक्त परिवार प्रथा लगभग मृतप्राय सी होकर अपनी अन्तिम सांसे ले रही है और शीघ्र ही वह भी पूर्णतया विलुप्त ही हो जायेगी।

👉 नई बहुएं भी “सिर्फ़ एक ही बच्चा” चाहती हैं।क्या यही समाज है? क्या यही हमारे पूर्वजों की विरासत है? जहां तक मेरा अपना विचार और मत है कि इस समस्या के मूल में सबसे बड़ी गलती हमारी संतानों की है,क्योंकि वही पिता जिसने 20- 25 वर्ष की उम्र में अपने माता- पिता की बात को मानकर अपना विवाह करके अपना परिवार बसाया है,अब वही अपनी ही संतानों की हठधर्मिता और कैरियर की मृगतृष्णा के दबाव में अपनी बेटी और अपने बेटे का विवाह 30- 40 वर्ष की उम्र तक न कर पाने के लिए विवश और लाचार दिखाई दे रहे हैं।

।।इस समस्या के घातक दुष्परिणाम।।

1- बहुत बड़ी संख्या में लड़के- लड़कियाँ डिप्रेशन में जा रहे हैं।

2- आज बच्चों का सही समय पर विवाह नहीं हो रहा है और न ही सही समय पर उन्हें कोई नौकरी मिल रही है।
3- समाज धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है,जिसके कारण आज बच्चे परिवार और समाज के साथ नहीं, बल्कि अकेले रहना पसंद करने लगे हैं।

4- हजारों नौजवान लड़के- लड़कियां अत्यधिक उम्र के कारण कुंवारे घूम रहे हैं।समाज के समझदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं।शादी – विवाह कराने में कोई किसी के साथ सकारात्मक सहयोग और प्रयास नहीं करना चाहता है।

5- विवाह,परिवार,बच्चे,यहाँ तक कि वृद्ध माता – पिता को भी वर्तमान युवा पीढ़ी अब बोझ समझ रही है।जबकि विवाह दुनियादारी का कोई निष्प्रयोज्य बंधन नहीं है,बल्कि यह तो घर- परिवार और समाज का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार होने के साथ ही साथ परिवार और समाज के संतुलित और समग्र विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी स्तम्भ है।
यह तो हमारी प्रजाति,सभ्यता,संस्कार और परिवार को आगे बढ़ाने का एक सफल एवं नितान्त आवश्यक तरीका है।

💥अब हम सब को जागरूक होने और समझने का समय आ गया है,क्यों कि हमने अपने बच्चों को ‘हद से ज्यादा’आजादी दे कर हमने उनकी समझ,उचित निर्णय लेने की क्षमता,सहनशीलता,सामंजस्य स्थापित करने और विषम परिस्थितियों में संघर्ष करने की क्षमता ही छीन ली है।
★बच्चों का विवाह टलता रहा और जब हुआ भी तो तब तक बहुत देर हो चुकी थी। फिर वही अकेलापन। अब हम सभी को मिलकर एक सकारात्मक प्रयास के माध्यम से अपने लड़कों के लिए विवाह की अधिकतम आयु 25 वर्ष और लड़कियों की 20 वर्ष निर्धारित कर पारस्परिक सहयोग से उनके विवाह की व्यवस्था करनी होगी, अन्यथा हमारा इतिहास लिखेगा कि –
“वह सनातन समाज,जिसने चुपचाप स्वयं को खत्म कर लिया।” हमें हमारा इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा,क्योंकि जब परिवार ही नहीं बचेगा,तो हमारे सनातनी समाज को भी देर- सवेर ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी।भारत में भी “सनातनी परिवार परम्परा” का पतन होना प्रारम्भ हो चुका है। यदि यही गति और दशा रही तो हमारे रक्त संबंधियों के 05 रिश्ते समाप्त होने की कगार पर हैं।ताऊ,चाचा,बुआ,मामा और मौसी जैसे रिश्ते आने वाले समय में देखने-सुनने को भी नहीं मिलने वाले हैं।आपका पौत्र या प्रपौत्र इस संसार में अकेला खड़ा होगा।उसे जब कभी अपने रक्त के रिश्तों कीआवश्यकता होगी तो इस पूरे ब्रह्मांड में उसका अपना रक्तसंबंधी कोई नहीं होगा। यह अत्यंत चिन्तनीय एवं विचारणीय ज्वलंत विषय है।
यह न केवल हमारे बच्चों को एकाकी जीवन जीने को मजबूर करेगा,बल्कि हमारी सनातन परिवार की सभ्यता को ही नष्ट कर देगा।

“अगर हम सभी उपरोक्त भयावह परिदृश्य को गंभीर समझते हैं,तो हमें इस समस्या पर गंभीरता से सकारात्मक विचार करना होगा।अपने घर-परिवार में,पति-पत्नी के बीच,रिश्तेदारों में,सगे-संबंधियों और मित्रों के मध्य समय-समय पर आयोजित होने वाली विभिन्न बैठकों एवं अन्यान्य सामाजिक/पारिवारिक आयोजनों में इस विषय पर सकारात्मक विचार एवं मंत्रणा करने के साथ ही साथ सकारात्मक पहल एवं प्रयास किया जाना ही श्रेयस्कर होगा,” तभी हम सभी अपनी सभ्यता,संस्कृति औऱ पीढ़ियों को बचा पाने में सफल होंगे अन्यथा “वह दिन दूर नहीं” जब हम सर्पिणी की भांति अपनी ही संततियों, परिवार, समाज,सभ्यता और संस्कृति को निगल जायेंगे फ़िर भविष्य का हमारा समाज और आने वाला हमारा इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।

जय श्री राम
हमारे_हनुमान_जी

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