
आई गर्मी,विकट दुपहरी,नौतपा जेठ में ढाए कहर,
थोड़ी सी राहत पाने चलें गाँव की ओर।
अपनत्व का भाव देखने चलें गाँव की ओर।
भेद-भाव से दूर रहना है
चलें गाँव की ओर,
प्रकृति संग रोमांस करने
चलें गाँव की ओर।
जहाँ छोटा बड़ा नहीं है सब ही मतवाले हैं,
सबके संग संग समय बिताने चलें गाँव की ओर।
नहीं चाहिए धन-स्टेटस
चलें गाँव की ओर,
गहरी नींद की चाहत है तो चलें गाँव की ओर।
सेहत संग मौज मनानी है
तो चलें गाँव की ओर,
कब सुबह हुई और शाम गई,
थालीभर भोजन डकार गए,
भरपूर नींद,रात भर सोने को चलें गाँव की ओर।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
29/05/26




