साहित्य

हर वर्ष दिवस मनाते हैं,

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

हर वर्ष दिवस मनाते हैं, फिर भूल वही दोहराते हैं,

तम्बाकू को दोष भी देते,और स्वयं उसे अपनाते हैं।”

 

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

 

🚭🚭🚭🚭🚭

 

तम्बाकू! तू धीमा ज़हर है,

जीवन का अपमान है।

हँसते-खेलते मानव पर,

मृत्यु का एक फरमान है॥

 

किसी के होंठों की शोभा है,

किसी की झूठी शान बना,

लेकिन कितनों के घर उजड़े,

इसका भी अनुमान बना।

 

गुटखा, बीड़ी, सिगरेट वाले,

सुन लो मेरी बात ज़रा,

एक-एक कश की कीमत में,

घटता जाता जीवन सारा॥

 

फेफड़ों में अंधियारा भरकर,

साँसों का संगीत चुराए,

मुख में घाव, हृदय में पीड़ा,

धीरे-धीरे मौत बुलाए॥

 

वैद्य कहें, विज्ञान बताए,

डॉक्टर रोज़ समझाते हैं,

फिर भी कुछ हठधर्मी लोग,

कहाँ किसी की मानते हैं!

 

चित्र छपे हैं डिब्बों पर भी,

लिखी हुई चेतावनी है,

लेकिन आदत के आगे तो,

हर समझदारी बौनी है॥

 

कटु सत्य मैं आज कहूँगा,

चाहे किसी को खल जाए,

केवल नारे, केवल भाषण,

कब यह लत बदल पाए?

 

ढाक के पत्ते तीन रहेंगे,

कुछ लोग यही कह देंगे,

बीड़ी, गुटखा और तम्बाकू,

मरते दम तक वे लेंगे॥

 

बिकना इसका बंद न होगा,

जब तक चाहत जीवित है,

लालच की इस अंधी दौड़ में,

जन-चेतना ही वंदित है॥

 

कानूनों से पहले मन में,

जागृति का दीप जलाना है,

अपने ही संकल्पों से अब,

भारत स्वस्थ बनाना है॥

 

आओ ऐसी शपथ उठाएँ,

जीवन का सम्मान करें,

तम्बाकू से नाता तोड़ें,

स्वस्थ धरा का गान करें॥

 

याद रहे—

 

क्षणिक नशा तो पल भर का है,

लेकिन जीवन अमूल्य धन,

तम्बाकू को जो त्याग सके,

वही कहलाए सच्चा जन॥

 

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर यही पुकार-

“नशे से नहीं, जीवन से प्यार!”

 

✍️ दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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