
कठिन धूप है,पांव जल रहे ,कैसे पति को गंगा नहलाऊं,
जिद है जाएंगे पैदल ही,मां कैसे तुमको ला पाऊं,
विश्वास नहीं तप का अपने,कैसे मां तुम्हे पुकारूं,
भोले बाबा तो मान जाएंगे,मैं मां तुम को कैसे मनाऊं।।
बंदोबस्त सभी कर लूंगी,पति की इच्छा का मान है रखना,
सुहाग के खातिर तप कर लूंगी रख लूंगी व्रत गर है रखना,
मां तू भी तो एक नारी है,नारी का दर्द समझ हां कर दो,
अंतिम मुराद मेरे पति की है, उसको मुझको पालन करना।।
सावित्री तो मुक्त करा लें गयी पति को,क्या मुझमें वह सतीत्व नहीं?
या फिर वह थी कुछ अति विशिष्ट जो मुझमें है वह तत्व नहीं,
मां! नारी सतीत्व का प्रश्न यहां सम्मान तुम्हें करना होगा,
मैं भी पति लाज की भीख मांगती चाहत अन्य कृतित्व नहीं।।
मेरे संग मां तेरी लाज बचेगी,नारी सतीत्व की कथा चलेगी,
सत्यवान मुंह मौत से आए,मेरे पति की भी तो आस बंधेगी,
वेद पुराण शास्त्र श्रुति सारे,नारी महत्व दर्शाते हैं,
मैं तो मात्र निमित्त होंउगी, मां आश्रयआस तेरे हाथ रहेंगी।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




