साहित्य

मालवा की पावन धरती पर

सीता सर्वेश त्रिवेदी

मालवा की पावन धरती पर,

एक दिव्य किरण जब आई थी,

गांव चौंडी की मिट्टी ने,

अहिल्या रूप में लाज बचाई थी।

 

साधारण घर की बेटी थी,

पर सपने बड़े निराले थे,

संस्कारों की गंगा बहती,

नयन बड़े ही भोले थे।

 

बालपन से ही धर्म-भाव था,

मन में करुणा की धारा थी,

दुखियों की पीड़ा देख-देख,

आंखों में अश्रुधारा थी।

 

एक दिन भाग्य ने करवट ली,

मल्हारराव की नजर पड़ी,

अहिल्या की सादगी देखकर,

भाग्य की नई राह जुड़ी।

 

खांडेराव संग ब्याह हुआ,

महलों में जब वह आई थीं,

पर राजमहल की चमक-दमक में,

संस्कार न कभी गंवाई थीं।

 

पति संग युद्धभूमि तक जाती,

प्रजा का दुख समझती थीं,

राजकाज के हर निर्णय में,

सत्य की राह पकड़ती थीं।

 

लेकिन जीवन सरल न था,

दुखों ने भी आहट दी,

युद्धभूमि में पति खोकर,

किस्मत ने बड़ी चोट दी।

 

आंसू पीकर भी अहिल्या ने,

हिम्मत कभी न हारी थी,

टूटा मन फिर जोड़-जोड़कर,

नई राह स्वयं संवारी थी।

 

सती प्रथा की अग्नि सामने,

समाज ने भी दबाव दिया,

पर मल्हारराव के शब्दों ने,

जीवन को नया प्रभाव दिया।

 

फिर बेटे का दुख भी सहा,

ममता का आंगन सूना था,

लेकिन प्रजा के हर आंसू में,

उनका अपना ही कोना था।

 

नारी होकर भी सिंह बनीं,

अन्याय से टकराती थीं,

प्रजा की रक्षा के खातिर,

रातों को भी जग जाती थीं।

 

काशी, गया, सोमनाथ में,

मंदिरों का निर्माण किया,

धर्म, दया और मानवता का,

सारे जग में मान किया।

 

नदियों पर घाट बनवाए,

प्यासों को जल दिलवाया,

गरीब, असहाय और दुखियों को,

मां बनकर गले लगाया।

 

उनकी गाथा आज भी सुन,

भारत का सिर उठ जाता है,

नारी शक्ति का हर स्वर,

अहिल्या नाम दोहराता है।

 

संघर्षों की वह अमर कहानी,

हर दिल को राह दिखाती है,

सच्ची सेवा और त्याग से,

नारी जग में पूजी जाती है।

सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर

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