
मेरी पहचान
मेरी पहचान
किसी नाम की मोहर नहीं,
न ही चेहरे की झलक भर—
मेरी पहचान तो
मेरे भीतर जलते साहस की लौ है।
जब भी अँधेरों ने घेरा,
मेरी पहचान ने ही
मुझे राह दिखायी,
गिरकर भी उठना सिखाया।
भीड़ के शोर में
खो जाना आसान था,
पर अपनी पहचान को
बचाए रखना ही
मेरा असली संघर्ष था।
मेरी पहचान
किसी और से तुलना नहीं,
यह तो मेरी अपनी कहानी है—
हर दर्द, हर जीत,
हर मोड़ की निशानी है।
समय बदले, हालात बदलें,
पर मेरी पहचान
हर रूप में साथ रही,
कभी धूप बनकर,
कभी छाँव की तरह।
मैं आज जो हूँ,
वो मेरी पहचान है,
और जो बनूँगी कल—
वो भी मेरी पहचान का
एक नया अध्याय है।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




