
है जयेष्ठ अति रेक , कथा पुरुषोत्तम होती।
देख नौतपा तेज , कहीं मंदिर जन बोती।
जन जीवन बेहाल, त्रस्त पशु पंक्षी होते।
मिली नहीं है छॉंव, पेड़ बिन सब ही रोते।।
दिनकर उगले आग, धरा तो जलती जाये।
देख नौतपा तेज, कहाँ जीवन सुख पाये।।
सूखे नदी तड़ाग, ग्रीष्म का दबाव बढता।
श्रमिक पसीना पोंछ, काम दिनभर वह गढ़ता।।
- डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




