
प्रकृति का नियम है, नौतपा का यह काल,
सूरज बरसाए अग्नि-किरणें, बढ़े तपन की आग।
रोहिणी में जब सूर्य पधारें, नभ अंगार बने,
लू के तीखे झोंकों से फिर, मौसम अंगार बने॥
तपती धरा पुकार रही तपते रहो हे सूर्य!”
तुम्हारी गर्मी से ही सजता, वर्षा का मधुर भविष्य।
जितना अधिक तपेगा अंबर, उतनी बरसे मेघ,
हरियाली की चूनर ओढ़े, खेत बनेंगे सेज॥
किसानों की आशा का यह, अनुपम शुभ संदेश,
नौतपा की प्रखर तपिश में, छिपा समृद्धि विशेष।
कीट-पतंगों का हो नाश, रोगाणु भी मिट जाएँ,
फसलों पर संकट के बादल, दूर कहीं खो जाएँ।
मानव को भी सीख यही, संयम का पालन हो,
जल और शीतलता से, जीवन का संरक्षण हो।
दोपहरी की दाहक ज्वाला से, जितना संभव बचना,
प्रकृति के इस कठोर नियम को, समझ अपनाना॥
यदि बीच में बरस पड़े, या शीतल हो परिवेश,
नौतपा गलना कहलाए, घट जाए उसका विशेष।
बढ़ें कीट, रोग,बाधाएँ, फसलों पर संकट छाए,
प्रकृति का संतुलन बिगड़े, मन आशंकित हो जाए॥
पर चाहे कितनी गर्मी, तन-मन को सताए,
नौतपा प्रकृति का प्रहरी बन, जीवन-पथ समझाए।
तप में ही छिपा है अमृत, यह संदेश अनूप,
धरती, जल, कृषि, मानसून का, यही सनातन रूप॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




