साहित्य

प्रतिष्ठा

संगीता वर्मा 

जब बात प्रतिष्ठा पर आए, और दिल में कांटा सा चुभ जाए, एक बात सोच लेना तब ही,हम रहे या अभी मर जाएं।

 

बस युद्ध तभी तुम चुन लेना,सब दुखों तुम सह लेना,दिल को तुम छोटा मत करना,तलवार थाम चलते रहना।

 

जब साथ कोई ना देता हो,तब समझो तुम्ही विजेता हो,हर ओर निराशा दिखती हो,असफलता पग पग दिखती हो,

 

दूर अपने और पराये हो,बस अपने साथ फिजाये हो,दुनिया तुमको डर पाएगी, हर कदम कदम भटकाएगी,

 

फिर भी तुम प्रण अपना रखना, बस अपने मन की ही सुनना,बाजू में तुम हिम्मत रखना,जिद अपनी तुम पूरी करना।

 

विश्राम कभी तुम मत करना,हर पग पग तुम लड़ते रहना,वीर हिम्मत नहीं हार सकते,विरोचित मृत्य सदा चुनते।

 

क्यों लहरों से पतवार डरे,बस हिम्मत रखना यार मेरे,आराम नींद को त्यागो तुम,एक अटल सत्य को साधो तुम।

 

रास्ता तूफान छोड़ देगा,तू मौजों को अगर छोड़ देगा,इस तरह गगन को चूमोगे,सूरज बनकर तुम घूमोगे।

 

संघर्ष तुम्हारा यदि जिंदा,क्या करेगा फांसी का फंदा,पीढ़ियां तुमको दोहराएंगी, सफलता की फसले लहराएंगी,

 

एक फसल तुम्हारी वह होगी, जो सारे कष्ट हटा देगी,दिन भर जो निंदा करते हैं,वह जय-जय कार लगाएंगे।

 

यह पीड़ा मुकुट बनेगी तब,कदमों में झुकेंगे आकर सब,रण में शहीद जो हो जाए,वह नाम अमर तब कर पाए।

 

तुम हार जीत को भूल सदा,हर कदम बढ़ा चलते रहना,बस प्रभु तुम आगे रखना,और प्रण को तुम आगे रखना।

 

स्वरचित रचना

संगीता वर्मा

कानपुर उत्तर प्रदेश

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