साहित्य

पुरुष -संवेदनाओं में छिपा मौन संघर्ष

शशि कांत श्रीवास्तव 

पुरुष -संघर्ष का दूसरा नाम है

क्योंकि दोनों हैं पर्याय,एक -दूसरे के,

उसका जीवन संघर्ष से शुरू होता है,

और -संवेदनाओं में खत्म होता है,

जो कि सदा मौन रहती है |

पुरुष -संवेदनाओं में छिपा मौन संघर्ष

वो हँसता है,पर हर हँसी के पीछे

एक अनकही सी थकान होती हैं,

कंधों पर जिम्मेदारियों का आकाश,

और दिल में अधूरे सपनों की धूप-छाँव,

आँसू भी उसके,आँखों तक आने से पहले

कहीं खो जाते हैं…,

क्योंकि वो एक पुरुष है,

वो सिर्फ एक शक्ति ही नहीं,

एक गहरी संवेदना भी है,

जो मौन में ही ज़्यादा जीती है ||

 

शशि कांत श्रीवास्तव

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

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