साहित्य

शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र और राष्ट्रीय एकता

भाषा किसी भी राष्ट्र की एकता की सूत्रधार और पराधीन होने पर भी कारागार की कुंजी होती है।कदाचित भाषा ही संप्रेषण और समन्वय का वह सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा कोई अपने मन ,मस्तिष्क और अंतरात्मा के मनोभावों,संवेगों तथा विचारों को दूसरों तक प्रेषित करते हुए स्वयं भी दूसरों के द्वारा पृष्ठपोषित होता है।ऐसे में इनकी भारत एक बहुभाषाभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ, बोलियाँ और संस्कृतियाँ पाई जाती हैं। इसलिए भारतीय शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समन्वय और भावनात्मक एकीकरण स्थापित करना भी है। इसी उद्देश्य से भारतीय शिक्षाशास्त्रियों ने स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत से ही“त्रिभाषा सूत्र” को शिक्षा नीति में उचित स्थान प्रदान किए जाने हेतु पुरजोर प्रयास किया।। यह सूत्र विद्यार्थियों में भाषाई दक्षता के साथ-साथ राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

त्रिभाषा सूत्र(थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला) के अंतर्गत विद्यार्थियों को सामान्यतः तीन भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं।जिनमें प्रथम भाषा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होती है।इसके अलावा दूसरी भाषा के रूप में राजभाषा हिंदी या अन्य भारतीय भाषा हो सकती है तथा अंग्रेज़ी या कोई आधुनिक विदेशी भाषा को तृतीय भाषा के रूप में शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया गया है। गौरतलब है कि हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेज़ी और एक अन्य भारतीय भाषा संस्कृत या उर्दू पढ़ाई जाती है, जबकि गैर-हिंदी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा, हिंदी और अंग्रेज़ी को स्थान दिया जाता है।

त्रिभाषा सूत्र का ऐतिहासिक विकास को देखा जाय तो नई शिक्षा नीति 2020 में कुछ नया प्रतिवेदन नहीं मिलता,बल्कि यह 1964-66 के कोठारी आयोग के ही नक्शेकदम पर बनाई गई लगती है।त्रिभाषा सूत्र की अवधारणा सर्वप्रथम कोठारी आयोग ने प्रस्तुत की। आयोग ने सुझाव दिया कि भारतीय विद्यार्थियों को मातृभाषा, हिंदी तथा अंग्रेज़ी का ज्ञान होना चाहिए ताकि राष्ट्रीय एकता और आधुनिक ज्ञान दोनों का विकास हो सके। इस आयोग ने भाषाई संतुलन को राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक माना।

ध्यातव्य है कि यद्यपि कोठारी आयोग ने शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र का प्रतिवेदन भारत सरकार को सौंप दिया था किंतु तत्कालीन परिस्थितियों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री की इस के विपरीत सोच होने के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।किंतु 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पहली बार त्रिभाषा सूत्र को औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसमें मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने और हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के विकास पर बल दिया गया। इस नीति का उद्देश्य था—

राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना,भारतीय भाषाओं को सम्मान देना,राज्यों के बीच भाषाई दूरी कम करना

हालाँकि कई राज्यों में राजनीतिक मतभेद और संसाधनों की कमी के कारण इसका पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका।

शिक्षा के लिए इससे कष्टकर परिस्थिति और क्या हो सकती है कि सभी उद्योगों की जननी और सभी प्रकार के आविष्कारों की आदि स्रोत के साथ सदैव उपेक्षात्मक व्यवहार किया गया।हालांकि 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा 1992 के संशोधन में भी त्रिभाषा सूत्र को बनाए रखा गया। इस अवधि में शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का साधन माना गया। केंद्रीय विद्यालयों तथा नवोदय विद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया गया।इस नीति के अंतर्गत भारतीय भाषाओं के संरक्षण पर बल दिया गया।विद्यार्थियों में सांस्कृतिक समझ विकसित करने का प्रयास हुआ।राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को शिक्षा से जोड़ा गया।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में बहुभाषिकता को बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए लाभकारी बताया गया। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण को महत्वपूर्ण माना गया।यही नई शिक्षा नीति के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।जिससे नई शिक्षा नीति 2020 में त्रिभाषा सूत्र को पुनः महत्व दिया गया। इसमें स्पष्ट कहा गया कि किसी भी भाषा को विद्यार्थियों पर थोपा नहीं जाएगा तथा भाषा चयन में राज्यों और विद्यार्थियों को स्वतंत्रता होगी।इस नीति की प्रमुख विशेषताओं के अनुसार कम से कम पाँचवीं कक्षा तक मातृभाषा/स्थानीय भाषा में शिक्षा।भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण पर बल।बहुभाषिकता को संज्ञानात्मक विकास का साधन मानना।“एक भारत श्रेष्ठ भारत” की भावना को बढ़ावा देना।

माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश जोकि भारत के सबसे बड़े शिक्षा बोर्डों में से एक है,भी त्रिभाषा सूत्र के मामले में अग्रणी है।इसकी स्थापना 1921 में हुई थी तथा यह हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर की परीक्षाओं का संचालन करता है।उत्तर प्रदेश में त्रिभाषा सूत्र को माध्यमिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रमों और भाषा विषयों के माध्यम से लागू किया गया है। परिषद हिंदी को प्रमुख भाषा के रूप में पढ़ाती है, साथ ही अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं—जैसे उर्दू, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, गुजराती, बंगला आदि—को भी पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है। ईशा दायित्व माध्यमिक स्तर पर हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं को अनिवार्य बनाना।संस्कृत, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं को वैकल्पिक विषय के रूप में उपलब्ध कराना।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप मातृभाषा आधारित शिक्षा को प्रोत्साहित करना।

विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और भाषाई समन्वय विकसित करना।उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह परिषद राष्ट्रीय एकता और भाषाई समन्वय को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

राष्ट्रीयता के विकास में त्रिभाषा सूत्र की भूमिका

1. राष्ट्रीय एकता का विकास

विभिन्न भाषाओं के अध्ययन से विद्यार्थियों में दूसरे राज्यों और संस्कृतियों के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न होती है।

2. सांस्कृतिक समन्वय

भाषा संस्कृति की वाहक होती है। अनेक भाषाओं का अध्ययन विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की विविधता से परिचित कराता है।

3. भावनात्मक एकीकरण

त्रिभाषा सूत्र उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत के बीच भावनात्मक दूरी कम करने का माध्यम बनता है।

4. लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास

यह विद्यार्थियों में सहिष्णुता, समानता और विविधता के सम्मान की भावना विकसित करता है।

5. वैश्विक और राष्ट्रीय संतुलन

अंग्रेज़ी के माध्यम से वैश्विक ज्ञान तथा भारतीय भाषाओं के माध्यम से राष्ट्रीय संस्कृति दोनों का संतुलन स्थापित होता है।

दुर्भाग्य से से कुछ राज्यों में भाषा संबंधी राजनीतिक विवाद,प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों की कमी,ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव त्रिभाषा सूत्र को विद्यार्थियों पर अतिरिक्त भाषाई बोझ के रूप में लोगों द्वारा बताए जाते हैं जोकि अनुचित हैं।त्रिभाषा सूत्र भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसकी शुरुआत कोठारी आयोग से हुई और जिसे 1968, 1986, 1992 तथा नई शिक्षा नीति 2020 तक निरंतर बनाए रखा गया। माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य शिक्षा बोर्ड इस नीति को व्यवहारिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह सूत्र केवल भाषाई ज्ञान नहीं देता, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समन्वय और भारतीयता की भावना को भी मजबूत करता है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह भारत की “विविधता में एकता” की भावना को और अधिक सुदृढ़ बना सकता है।

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