साहित्य

ढलता सूरज

राजीव त्रिपाठी

दूर कहीं ढलता सूरज
मानो अपनी थकान मिटाता है!!
संदेश छुपा होता है उसमें
लौट के सूरज जरूर आता है!!
दिन की तपिश और पसीने की बूंदे,
परिश्रम मजदूर दोहराता है!!
कई रातें दरमियां होती है
सूरज के उदय और ढल जाने में,
मानो ढलता उगता सूरज,
निरंतता दोहराता है!!
इसी तरह मजदूर भी अपनी
आजीविका चलाता है!!
निरंतता होती उसके श्रम में
श्रम साध्य हो जाता है!!
रिश्ते भी कैसे उगते ढलते हैं
उगता यौवन ढल जाता है!!
समय निरंतर चलता है और
मानव कालचक्र दोहराता है!!
जीवन मृत्यु किसके हाथ में
समय जर्जर हो जाता है!!
रिश्ते रोज नए होते हैं
हर रोज पुराना पल आता है!!
दूर कहीं ढलता सूरज
मानो अपनी थकान मिटाता है..!!

स्वरचित – राजीवत्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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