
ऋषि कश्यप और अदित की दो
हिरण्यकश्प हिरणाक्ष संतान
हिरण्यकश्प के पुत्र ध्रुव प्रह्लाद।
ध्रुव भक्ति जब करता दोनों करें क्लेश,
कष्ट सदा उसे दे रहे प्रभु देते आशीष।
हिरण्यकश्प नेभक्ति से लिया ब्रह्म वरदान,
सुबह शाम रात को असुर मनुज करे नहीं संहार।
अस्त्र शस्त्र से में न मरूँ दीजिये यह वरदान,
नहीं मरूँ में पशु पक्षी से दीजिये यह दान।
ध्रुव भक्त बिष्णु भगवान का डरने को नहीं बाध्य,
प्रेम भक्ति से वह पुकारे लेता विष्णु का नाम।
पर्वत नीचे फेक दिया हाथी तले दबाया,
होलिका में बुआ जल गई भक्त रक्षा पाया।
गरम खम्ब जब बांध कर अग्नि रहे जलाय।
खम्ब को ही फाड़कर नरसिंह अवतार प्रभु आय।
हिरण्यकश्प मार कर दिया सिहांसन राज।
ऐसा वर प्रभु दीजिये जगत नहीं है चाहिए,
मिले आपका हरदम मुझको साथ।।
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




