
होगा आलम कैसा जब दीदार तेरा होगा
ढलता सूरज होगा कि निकलता चांद होगा
सामने जब आएगा सनम वो मेरा
बदरा की छाएगी घटा कि उफ़ान पर समुद्र होगा
शर्म से बादलों में छुप जाएगा चांद
या चिलमन सनम के चेहरे पर होगा
हयां से लाल होंगे गाल कि कातिलाना आंखों का काजल होगा
केशो से महकती मोगरे की खुशबू या चंदन सा चमकता सनम होगा
डर से दांतों तले दबेंगे होंठ कि अंगुली में धूमता दुपट्टा होगा
चांदनी से चमकेगा हुस्न तेरा इधर मचलता मन मेरा होगा
वो आलम कैसा होगा जब दीदार तेरा होगा
आगोश में आने को तेरे तड़पता ये दिल मेरा होगा
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित कविता




