साहित्य

मायके की पुकार

सपना कुमारी

मायके की पुकार

माया बालकनी में खड़ी आसमान को देख रही थी। आंखों में आंसू थे और चेहरे पर उदासी वाली खामोशी थी। तभी उसके पति रवि ने मुस्कुराते हुए कहा,

“क्या देख रही हो?”

माया चौंक गई और जल्दी से अपने आंसू पोंछने लगी।

पास बैठी उसकी सास ताना मारते हुए बोलीं,

“बेचारी को मायके की याद आ रही होगी। पांच साल हो गए, कभी गई नहीं। मेरा पोता भी छह साल का हो गया, लेकिन आज तक इसके मायके से कोई सगुन तक नहीं आया।”

यह सुनकर माया का दिल भर आया। उसने अपने बेटे आरव को सीने से लगा लिया।

थोड़ी देर बाद आरव मासूमियत से बोला,

“मम्मी… हम नाना जी के घर कब जाएंगे? सबके नाना आते हैं, मेरे नाना क्यों नहीं आते?”

यह सुनते ही माया की आंखों से आंसू बह निकले।

उसे अपने मायके सिरसा की याद आने लगी।

उसे वो दिन याद आ गया जब उसकी शादी हुई थी।

विदाई के समय उसकी भाभी ने चुपके से अपनी मां को दो लाख रुपए दे दिए थे। जब यह बात घरवालों को पता चली, तो घर में बहुत बड़ा बवाल खड़ा हो गया।

माया के भाई ने अपनी पत्नी की गलती छुपाने के लिए सारा गुस्सा माया पर निकाल दिया। गुस्से में उसने माया का गला तक दबाने की कोशिश की थी।

उस दिन के बाद माया ने अपने मायके सिरसा से सारे रिश्ते तोड़ दिए।

मां पहले से ही कमजोर और परेशान रहती थीं, और भाई अपनी पत्नी के कहने पर चलने लगा था।

समय बीतता गया।

माया अपने ससुराल में सबकी सेवा करती रही, लेकिन उसके दिल में मायके की कमी हमेशा चुभती रही।

एक दिन अचानक उसके दरवाजे पर दस्तक हुई।

दरवाजा खोला तो सामने उसका भाई खड़ा था। चेहरा थका हुआ था और आंखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।

माया उसे देखकर घबरा गई।

भाई धीरे से बोला,

“डर मत माया… आज लड़ने नहीं आया हूं।”

माया चुप रही।

तभी पीछे से उसकी भाभी आगे आई।

उनकी आंखों में आंसू थे।

“माया… मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। मां अब बहुत बीमार रहती हैं। हर दिन तुम्हारा नाम लेकर रोती हैं। घर पहले जैसा नहीं रहा… शायद मेरी गलतियों ने ही सब बिखेर दिया।”

माया को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

जिस भाभी ने उसे कभी चैन से जीने नहीं दिया, आज वही हाथ जोड़कर खड़ी थी।

भाई रोते हुए बोला,

“बहन… इंसान जब अपनों को खोने लगता है, तभी उनकी कीमत समझ आती है। एक बार घर चलो। मां बस तुझे देखना चाहती हैं।”

माया की आंखें भर आईं।

उसने अपने बेटे की तरफ देखा। आरव खुशी से बोला,

“मम्मी! अब हम नाना जी के घर जाएंगे ना?”

माया के चेहरे पर सालों बाद हल्की सी मुस्कान आई।

कुछ दिनों बाद माया अपने मायके सिरसा पहुंची।

दरवाजे पर उसकी बूढ़ी मां बैठी थीं। जैसे ही उन्होंने माया को देखा, कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया।

पूरा घर रो पड़ा।

उस दिन माया ने समझा कि रिश्ते कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते, बस वक्त और अहंकार उन्हें दूर कर देते हैं।

और कभी-कभी एक “माफ कर दो” बिखरे हुए परिवार को फिर से जोड़ देता है।

✍️ लेखिका — सपना कुमारी, कोल्हापुर

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