साहित्य

अभी बाकी है

जीतेन्द्र गिरि

गिरा हूँ राह में कई दफ़ा, मगर थका नहीं हूँ मैं,

हवाओं ने बुझाना चाहा, मगर झुका नहीं हूँ मैं।

जो समझ बैठे कहानी का यही अंतिम पड़ाव है,

उन्हें क्या ख़बर, सफ़र का असली सिलसिला अभी बाकी है।

 

कभी हालात ने रोका, कभी किस्मत ने आज़माया,

कभी अपनों की चुप्पी ने भी दिल को खूब सताया।

मगर हर चोट ने मुझको नया हौसला ही सौंपा है,

मेरे भीतर जीत का एक कारवाँ अभी बाकी है।

 

जो मेरी हार के किस्से सुनाकर मुस्कुरा रहे हैं,

मेरे सपनों की उड़ानों पर पहरे बिठा रहे हैं,

उन्हें कह दो कि धैर्य मेरा यूँ व्यर्थ नहीं जाएगा,

मेरे हिस्से का आसमान छूना अभी बाकी है।

 

वक्त के हाथों लिखी तक़दीर बदलते देखी है,

सूखी शाखों पर भी फिर से कलियाँ निकलते देखी हैं।

मैं अँधेरों से नहीं डरता, ये अनुभव सिखा गया,

मेरे सूरज का पूरे शबाब से उगना अभी बाकी है।

 

निभा रहा हूँ चुपचाप अपना किरदार दुनिया में,

न शिकायत है किसी से, न शिकन है पेशानी में।

जब मेहनत की कहानी का अंतिम पृष्ठ खुलेगा,

मेरे नाम पर तालियों का गूँजना अभी बाकी है।

 

न खोया है जो पाया था, न टूटा हूँ सफ़र में मैं,

अभी विश्वास ज़िंदा है मेरे दिल के नगर में।

ये मंज़िल तो बस एक पड़ाव है जीवन की राहों का,

बहुत कुछ देखना, सीखना और पाना अभी बाकी है।

 

— मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

(प्रेरणा, आत्मविश्वास और संघर्ष की मानवीय अनुभूति पर आधारित)

 

~जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”

युवा लेखक,कवि एवं साहित्यकार

सक्ती (छत्तीसगढ़)

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