साहित्य

मेरी रंगों में खून नहीं कविता दौड़ती

डॉ रामशंकर चंचल 

मध्य प्रदेश आदिवासी पिछड़े अंचल झाबुआ में जन्म हुआ डॉ रामशंकर चंचल जी ख़ुद परेशान हैं उनका कहना है कि, मुझे ऐसा लगता है मेरी रगों में खून नहीं कविता दौड़ती है, ईश्वर ने मुझे इतना संवेदनशील भावुक बना रखा है कि मैं ख़ुद के साथ साथ मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्राणियों की पीड़ा और दर्द समेटे रात गुजरता हूं

कविता मैने कभी नहीं लिखी, सच तो यह है कि कविता मुझे इतना प्यार सम्मान करती है कि वह जन्म से मेरे साथ रमी बसी है और स्वतं ख़ुद मुझे सोने नहीं देती हैं और फिर

वह किसी भी व्यक्ति का जीवंत सजीव, निर्जीव की याद दिलाते हुए

मुझे उठा देती है और कविता जन्म लेती है, सच तो यह कि कविता लिखना आसान नहीं है यदि वह असली कविता है तो, भाषा शैली की जटिलता और प्रभाव डाल कर लेखन कभी नहीं किया , वहीं लिखा जो ईश्वर ने आत्मा ने लिखाया है और शायद यही वजह है कि आज हजारों लाखों चाहने वालों देवत्व इंसान पाठक द्वारा सराही जाती है और इंतजार रहता है उन्हें , सहज सरल भाषा शैली में व्यक्त होने से कोई भी उसे आसानी से समझ जाता है और उसके दिल और दिमाग में दस्तक दे बैठ जाती हैं यह सत्या है जो मैने ख़ुद महसूस किया है मुझे वहीं कविता अच्छी लगती हैं जो मन और आत्मा से निकल आया हर शब्द मुखर होते है

मैं चाहकर भी इस कविता के अथाह प्यार और प्रेम से अलग नहीं हो पाता हूं यह मुझे तभी सोने की अनुमति देती है जब उसका जन्म हो जाता हैं ख़ुद नींद आंखों में दस्तक दे सुला देती हैं

अजीब रिश्ता है कविता से सभी ने मुझे छोड़ा पर कविता है जो मुझे कभी नहीं छोड़ती हैं यहीं वजह है कि मैं कविता से बेहद प्यार करता हूं और यही मेरी ऊर्जा ताकत है जीवंत सजीव रखें है

बात कुछ अजीब सी लगती होगी उन्हें जो कविता या सृजन को नाम, प्रसिद्धि और धन कमाने के लिए उपयोग करते हैं,, ज्यादा लोग ऐसे हैं या कहे की कुछ ही है जो कविता करते हैं क्यों कि यह मज़ाक नहीं है परम् शक्ति ईश्वर कृपा है आशीष है मेरा शोभाग्य है कि उसने जिंदा रखें सक्रिय रखें ऊर्जा और ताकत दे प्रसन्न हो जीने को कविता नसीब को मेरे लिए चयन किया और उसका प्यार और आशीष दिया

सच तो यह है कि मैं अक्सर डरता हूं कोई मेरे पास साथ है तो वह भी कविता करने लगता हैं ऐसे विरले इंसानों में सेकड़ो है जो मेरे पास साथ रहे और अद्भुत लेखन कविता कर रहे हैं और उन्हें सराहा जाता हैं ख़ुद चौक जाता हूं जब वह यह कहते हैं,सर जी हमने सोचा नहीं था, कभी कविता करेंगे सब कुछ आपके सानिध्य में रहकर सिखा है और जब अक्सर यह कहते हुए सुनता हूं चौक जाता हूं

खैर जो सत्य है वह ईश्वर कृपा से उसकी इच्छा से आज लिख दिया और लिख कर मुझे अच्छा लगा है कि कविता की मज़ाक नहीं है वह सचमुच वंदनीय हैं पूज्य हैं और ईश्वर तुल्य आशीष है

 

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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