
दिल नहीं है कोई पत्थर की सिल्ली,
ये तो कच्ची मिट्टी का दिया है।
हवा के झोंके से डरता है,
पर तूफाँ में भी जलता हुआ जिया है।
इसमें चेहरों के अक्स नहीं मिलते,
यहाँ नीयत का रंग चढ़ता है।
जो खोट लिए आए, काला दिखे,
जो प्यार लिए आए, सुनहरा लगता है।
जमाने ने इस पर बहुत पत्थर फेंके,
कई दाग दिए, कई दरारें दीं।
पर कमबख्त ने फिर भी ये सीखा नहीं,
हर ठोकर के बाद फिर धड़कना है।
कभी महफ़िल में हँसकर महक जाता है,
कभी तन्हाई में दरिया बन जाता है।
लोग कहते हैं अब दिल कहाँ रहे,
पर देखो तो हर सीने में धड़क जाता है।
ममता झा मेधा
डालटेनगंज



