साहित्य

सफ़र के निशां

डॉ आशीष मिश्र उर्वर 

कुछ सिखाकर चल दिए तो कुछ हँसाकर चल दिए,

ज़िन्दगी की राह में वह गुल खिलाकर चल दिए।

कौन कहता है कि उनसे दिल दुखा या चोट लगी?

वे तो अपनी याद को चंदन बनाकर चल दिए।

जो मिले पल भर को भी, वो मील का पत्थर हुए,

सोई हुई उम्मीद को फिर से जगाकर चल दिए।

खेल था बस चार दिन का, सब निभाकर चल दिए,

मुखौटे चेहरे पे जो थे, वो गिराकर चल दिए।

जिसे समझा था सहारा, वो महज़ एक साया था,

जो जलाया था दिया, खुद ही बुझाकर चल दिए।

भीड़ थी इस शहर में, पर हर मुसाफ़िर है अकेला,

अपनी अपनी दास्ताँ सबको सुनाकर चल दिए।

 

डॉ आशीष मिश्र उर्वर

कादीपुर, सुल्तानपुर

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