
बस यही बात दिल को सताती रही।
बात ख़्वाब-ओ-ख़यालों की आती रही।
बात कुछ ख्वाब से जब हक़ीकत बनी,
मुझसे फिर वो निगाहेँ चुराती रही।
पल वो जो गम खुशी में न कुछ फर्क हो,
शायरी में वो सब बातें आती रही।
क़ाश वो रूबरू आके कह देते कुछ,
मै दुआओं के दीपक जलाती रही।
दोश कि वो हवाओं में लहरा रहे,
मैं ज़मी पे घरौंदे बनाती रही।
जब मुलाक़ात की बात मैने कही,
रोज़ ही वो बहाने बनाती रही।
बात ऐसी नहीं कुछ भी वैसी नहीं,
इक ज़माने की बस याद आती रही।
सामने आ न कुछ कह सकी शिवपुरी
पार पर्दे के बस झिलमिलाती रही।
संगीता श्रीवास्तव




