साहित्य

जुगनूं बाल कविता

जयचन्द प्रजापति

रात में जुगनूं

मस्ती करते हैं

उड़ते हैं गगन में

 

कभी इधर, कभी उधर

दूर तक दौड़ लगाते हैं

 

एक लम्बी उड़ान

जुगनूं जब भरता है

 

सारे बच्चे देखकर

खिलखिलाते हैं

 

जब जुगनूं नीचे आता है

सब बच्चे पकड़ने दौड़ते

 

जुगनूं चकमा देकर

फिर लेता है एक उड़ान

 

नहीं पाते जुगनूं को बेचारे

सब बच्चे हाथ मलते रह जात

जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

 

कविता का भावार्थ– जयचन्द प्रजापति की इस बाल कविता में रात में आसमान में चमकते जुगनुओं की मस्ती दिखती है; वे उड़ते-घूमते कहीं जा पहुँचते और फिर तेज़ी से उड़ान भरकर बच्चों को हँसाते हैं। जब जुगनू जमीन के करीब आता है तो बच्चे उसे पकड़ने की दौड़ लगाते, पर जुगनूं चतुराई से भाग जाता और फिर ऊँची उड़ान ले लेता है; बच्चे उसे पकड़ न पाकर सिर्फ हाथ मलते रह जाते।

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