साहित्य

मूक कशमकश

डॉ. दक्षा जोशी'निर्झरा'

मशगूल हैं ऐसे कि भुला भी नहीं सकते,

तक़दीर है ऐसी कि उन्हें पा भी नहीं सकते।

इक अक़्स ठहर गया है इन गीली नज़रों में,

सामने है सरब, हाथ बढ़ा भी नहीं सकते।

वो दर्द है जो रूह में ख़ामोश पला है,

महफ़िल में इसे रो के सुना भी नहीं सकते।

दहलीज़ पे ठहरे हैं अजब मोड़ पे आकर,

लौटें किस तरफ़, आगे हम जा भी नहीं सकते।

तस्वीर जो खींची थी कभी ख़्वाब ने दिल पर,

रंग उसके धुंधले हैं, मिटा भी नहीं सकते।

राज़-ए-ग़म-ए-हयात यही है कि ऐ ‘निर्झरा’,

हम वाबस्ता हैं उनसे, जिन्हें पा भी नहीं सकते।

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!