साहित्य

सच्चा साहित्यकार कैसे बनें लेख

जयचन्द प्रजापति

सच्चा साहित्यकार बनने के लिए खुद में एक त्याग की भावना होनी चाहिए। सरलता, सादगी और समाज के सबसे कमजोर प्राणी पर सहानुभूति का होना अत्यंत आवश्यक गुण माना जाता है।

 

आप अच्छी रचना लिखने में सचमुच माहिर हैं और आम बोलचाल पर निम्न से निम्न भाषा का स्तर बना देना आपके साहित्यिक गुणों को कमजोर करता है और जहाँ आप एक परिपक्व साहित्यकार बनने की ओर अग्रसर हैं वहीं निम्नतर भाषा अर्थात हीनभावना किसी के प्रति दर्शाना अपरिक्वता की ओर बढ़ना माना जाता है।

 

आपके अंदर किसी के प्रति कटु शब्दों का आह्वान करने की ताकत नही होनी चाहिए। किसी को उपेक्षित दृष्टि से अवलोकन करना यह आपके आंतरिक शक्ति का हनन होने से कम नहीं।

 

बिल्कुल आप समुद्र की तरह गहरे साहित्यकार बन जाइये। अच्छी बात है लेकिन गहरे समुद्र का होना ठीक है। उसके अंदर खारापन अर्थात आचरणहीनता उसके गहरे पानी होने पर चाबुक चलाता है। आपका एक गलत व्यवहार आपकी चमक फीकी कर सकती है।

 

जरूर आप अच्छा लेखन करते हैं। समाज सुधारने में पूर्णरूपेण लगे हैं। एक साहित्यकार आम पाठक या आमजन की ही तरह होता है। उसे भी अपने अंदर सुधार करने की क्षमता होनी चाहिए। इंसानियत, मानवता, आचरण इन सब चीजों से लैस रहना चाहिए।

 

आमजन के अंदर सहीं सोंच जरूर भरिये और खुद भी अच्छे विचारों को आत्मसात करिये। एक उच्च कोटि का साहित्यकार पक्षपात नहीं करता है। जरूरत पड़ने पर अपने सच्चे मित्र की भी खटिया खड़ी करने का गुण रखता हो।

 

एक स्थिर मन बनाकर सत्य के पथ पर कदम रख कर चलना पड़ेगा। अपने अंदर बड़े साहित्यकार होने का दम्भ न भरिये अन्यथा यह उड़ान जल्दी ही धराशायी कर देगी।

 

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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